सिंगरौली के बैगा आदिवासी मूलभूत सुविधाओं से वंचित, बिजली-पानी के लिए तरसे ग्रामीण
सिंगरौली (मध्य प्रदेश)। सरकार द्वारा आदिवासियों के उत्थान और उनके जीवन स्तर को सुधारने के लिए भले ही तमाम योजनाएं संचालित करने के दावे किए जाते हों, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। सिंगरौली जिले के चितरंगी जनपद अंतर्गत आने वाले एक दूरदराज गांव में आज भी बैगा आदिवासी समुदाय के लोग मूलभूत सुविधाओं के अभाव में नारकीय जीवन जीने को विवश हैं।
अंधेरे और प्यास में कट रही जिंदगी
आधुनिक युग और तकनीकी विकास के इस दौर में भी चितरंगी के इस गांव के बैगा आदिवासी परिवारों के घरों में बिजली नहीं पहुंच पाई है। सूरज ढलते ही पूरा गांव घने अंधेरे में डूब जाता है, जिससे बच्चों की पढ़ाई से लेकर दैनिक जीवन तक भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बिजली के साथ-साथ इस क्षेत्र में पेयजल का संकट भी विकराल रूप ले चुका है। गांव में पीने के साफ पानी का कोई स्थायी स्त्रोत न होने के कारण इन आदिवासियों को अपनी और अपने परिवार की प्यास बुझाने के लिए मजबूरी में नाले का गंदा पानी पीना पड़ रहा है। दूषित पानी पीने के कारण ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
रिश्वत न देने पर अनसुनी
समस्याओं से त्रस्त ग्रामीणों का आरोप है कि जब उन्होंने अपनी इन बुनियादी परेशानियों को दूर करने की गुहार लगाई, तो स्थानीय सरपंच और उनके सहयोगियों द्वारा विकास कार्यों की एवज में एक लाख रुपये की रिश्वत की मांग की गई। गरीब और दिहाड़ी मजदूरी कर जीवनयापन करने वाले आदिवासी इतनी भारी-भरकम राशि देने में असमर्थ हैं। ग्रामीणों का कहना है कि रिश्वत न दे पाने के कारण उनकी शिकायतों और समस्याओं को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा है।
प्रशासन से त्वरित कार्रवाई की मांग
इस गंभीर और संवेदनशील मामले को लेकर स्थानीय लोगों और बुद्धिजीवियों में भारी रोष व्याप्त है। ग्रामीणों ने सिंगरौली जिला कलेक्टर और जिला प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप करने की अपील की है। क्षेत्रवासियों ने मांग की है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए और रिश्वत मांगने के आरोपों में लिप्त दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि इन वंचित आदिवासी परिवारों को शीघ्र ही बिजली और शुद्ध पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं मिल सकें।
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