केएन बालागोपाल का दावा- CEC को हटाने का प्रस्ताव पहले विपक्ष के नेता ने पेश किया था, बाद में UDF सरकार ने अपनाया
तिरुवनंतपुरम (केरल): सीपीआई(एम) नेता और केरल के पूर्व वित्त मंत्री केएन बालागोपाल ने मंगलवार को दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग वाला केरल विधानसभा प्रस्ताव मूल रूप से विपक्ष के नेता पिनारयी विजयन द्वारा पेश किया गया था और बाद में सत्तारूढ़ संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) सरकार ने इसे अपनाकर आधिकारिक सरकारी प्रस्ताव के रूप में प्रस्तुत किया। बालागोपाल ने कहा, “दरअसल, यह प्रस्ताव मूल रूप से विपक्ष के नेता द्वारा पेश किया गया था। आवेदन प्राप्त होने के बाद, UDF सरकार ने इसे अपनाने और आधिकारिक सरकारी प्रस्ताव के रूप में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया।”
विधानसभा में पारित हुआ प्रस्ताव
यह प्रस्ताव सोमवार को केरल विधानसभा में पारित किया गया था, जिसमें चुनाव आयोग के कामकाज पर लगे आरोपों के मद्देनजर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को हटाने और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए जिम्मेदार पैनल में बदलाव की मांग की गई थी। मुख्यमंत्री वीडी सतीशन द्वारा पेश किया गया यह प्रस्ताव संशोधनों के साथ पारित किया गया। भाजपा के तीन सदस्यों ने प्रस्ताव का विरोध किया।
SIR प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं पर जताई चिंता
इस प्रस्ताव में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित अनियमितताओं पर चिंता व्यक्त की गई। इसमें आरोप लगाया गया कि पुनरीक्षण प्रक्रिया में तकनीकी हेरफेर और अनियमितताओं के कारण हाशिए पर रहने वाले समुदाय, अल्पसंख्यक, प्रवासी श्रमिक और युवा मतदाता अपने मतदान के अधिकार से वंचित होने के खतरे में हैं। प्रस्ताव में मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा गया कि चुनाव आयोग ने सॉफ्टवेयर सिस्टम के माध्यम से मतदाता सूची तैयार करने के लिए मतदाता पंजीकरण अधिकारियों की शक्तियों को सीमित कर दिया है और मौजूदा नियमों के विपरीत फॉर्म 6 में संशोधन किया है। इसमें उन रिपोर्टों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें कहा गया है कि आयोग के अधिकांश सदस्यों ने इन कार्रवाइयों से असहमति व्यक्त की है।
मतदाता सूची से हटाए गए नाम बहाल करने की मांग
सुधारात्मक उपायों की मांग करते हुए प्रस्ताव में चुनाव आयोग से कथित अनियमितताओं को दूर करने और उन सभी पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार को बहाल करने का आग्रह किया गया, जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे। इसमें कहा गया कि चुनाव आयोग, एक संवैधानिक निकाय के रूप में, निष्पक्ष रूप से और सरकारी प्रभाव से स्वतंत्र होकर कार्य करना चाहिए। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि मतदाता सूची में कथित हेरफेर ने चुनावी प्रक्रिया में जनता के विश्वास को कमजोर किया है।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति समिति में बदलाव का प्रस्ताव
प्रस्ताव में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए जिम्मेदार समिति के पुनर्गठन की भी मांग की गई। इसमें प्रस्ताव दिया गया कि समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया जाए। मौजूदा चयन प्रक्रिया का हवाला देते हुए प्रस्ताव में कहा गया कि समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर रखने और समिति के पुनर्गठन से नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता कमजोर हुई है। प्रस्ताव में चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए कदम उठाने का आग्रह किया गया, जिसमें आयोग की निष्पक्षता पर उठे गंभीर संदेहों का हवाला दिया गया। इसमें कहा गया कि लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने और संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत नागरिकों को प्रदत्त मतदान अधिकारों को बनाए रखने के लिए ये उपाय आवश्यक हैं।
भाजपा विधायक ने संशोधन पेश कर मीडिया रिपोर्टों पर उठाए सवाल
संशोधन पेश करते हुए भाजपा विधायक वी. मुरलीधरन ने कहा, “मैं इस प्रस्ताव के तीसरे अनुच्छेद में '1960 के मतदाता पंजीकरण नियमों का उल्लंघन करते हुए फॉर्म 6 में संशोधन किया गया' वाक्यांश के बाद निम्नलिखित शब्द जोड़ना चाहता हूं। इस मीडिया रिपोर्ट को स्वयं चुनाव आयोग ने गलत बताया है।” उन्होंने आगे कहा, “मैं चौथे अनुच्छेद के आरंभिक भाग में 'प्रशासनिक प्रभाव के बाद' वाक्यांश के बाद निम्नलिखित शब्द भी जोड़ना चाहता हूं: हम निहित स्वार्थों द्वारा संवैधानिक निकाय चुनाव आयोग को बदनाम करने के प्रयासों की कड़ी निंदा करते हैं।”
(एएनआई)
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