भोजशाला, तपती धूप में भी छोटा पड़ा मां का आंगन, उमड़ा भक्तों का सैलाब
धार। ऐतिहासिक भोजशाला परिसर में इन दिनों भक्ति और उत्साह का एक अभूतपूर्व माहौल देखा जा रहा है। वर्षों से जारी कानूनी और सामाजिक गतिरोध के समाप्त होने के बाद, चिलचिलाती और तपती धूप के बावजूद मां वाग्देवी (सरस्वती) के भक्तों का ऐसा सैलाब उमड़ा कि मंदिर परिसर का आंगन भी छोटा पड़ गया।
बदला सालों पुराना इतिहास
विगत कई दशकों से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के साल 2003 के आदेश के मुताबिक, यहां एक व्यवस्था लागू थी। इस व्यवस्था के तहत हर शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय को नमाज अदा करने की इजाजत थी, जिसके कारण हिंदू समाज को परिसर से बाहर रुकना पड़ता था। वहीं हिंदुओं को केवल मंगलवार को पूजा की अनुमति थी। लेकिन हाल ही में हाई कोर्ट द्वारा आए ऐतिहासिक फैसले ने इस सालों पुरानी व्यवस्था को पलट दिया।
अदालत ने एएसआई (ASI) के उस पुराने आदेश को रद्द करते हुए स्पष्ट किया है कि भोजशाला का मूल धार्मिक स्वरूप राजा भोज द्वारा निर्मित मां वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर ही है।
जयघोष से गूंजा आसमान
अदालत के फैसले के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि जिस दिन (शुक्रवार) को यहाँ नमाज होती थी और हिंदू समाज बाहर इंतजार करता था, उसी दिन इस बार पूरे परिसर में मां वाग्देवी के जयकारों की गूंज सुनाई दी। हजारों की संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने कतारबद्ध होकर मां सरस्वती के तैलचित्र की पूजा-अर्चना की और आरती में भाग लिया। इस दौरान 'जय श्री राम' और 'मां सरस्वती की जय' के उद्घोष से पूरा आसमान गूंज उठा।
हाईकोर्ट दिया था ऐतिहासिक फैसला
माननीय उच्च न्यायालय ने हर शुक्रवार को होने वाली नमाज की अनुमति को पूरी तरह समाप्त कर दिया है और मुस्लिम पक्ष को नमाज के लिए वैकल्पिक भूमि तलाशने का सुझाव दिया है। कोर्ट ने इस ऐतिहासिक परिसर को मां सरस्वती का मंदिर मानते हुए हिंदू समाज को नियमित रूप से पूजा-अर्चना करने का पूर्ण अधिकार सौंप दिया है।
लंदन से मूर्ति लाने का निर्देश
इसके साथ ही केंद्र सरकार को यह निर्देश भी दिया गया है कि लंदन के 'ब्रिटिश म्यूजियम' में रखी मां वाग्देवी की मूल ऐतिहासिक प्रतिमा को वापस भारत लाने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। तपती गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच भी भक्तों की आस्था डिगी नहीं।
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