‘काला’ या ‘मोटा’ कहने मात्र से तलाक का आधार नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की युगल पीठ ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में कहा है कि पत्नी द्वारा पति को उसके रंग या शरीर को लेकर कथित तौर पर ‘काला’ या ‘मोटा’ कहे जाने मात्र को विवाह-विच्छेद का आधार नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि वैवाहिक क्रूरता और परित्याग जैसे गंभीर आरोपों को केवल लगाए जाने से नहीं, बल्कि ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर साबित किया जाना आवश्यक है। न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू और न्यायमूर्ति सचिन सिंह राजपूत की युगल पीठ ने पति की ओर से दायर अपील खारिज कर दी। उच्च न्यायालय ने परिवार न्यायालय, जांजगीर के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें पति की ओर से मांगी गई तलाक की डिक्री को अस्वीकार किया गया था। उच्च न्यायालय ने यह फैसला 18 सितंबर 2026 को सुनाया।
2019 में हुआ था विवाह
उच्च न्यायालय की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जांजगीर-चांपा निवासी आकाश घोष का विवाह रायगढ़ निवासी पूजा सीत से सात मार्च 2019 को हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार हुआ था। विवाह के बाद पत्नी करीब दो-तीन महीने तक पति और उसके परिवार के साथ रही। पति का आरोप था कि इस दौरान पत्नी उसके प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार करती थी, उसे झूठे मामलों में फंसाने की धमकी देती थी और बार-बार अपने मायके चली जाती थी।
पत्नी के राजस्थान जाने का भी आरोप
पति के अनुसार, पत्नी एक रिश्तेदार के विवाह में शामिल होने के लिए उसकी सहमति के बिना राजस्थान भी गई और करीब 25 दिन बाद लौटी। इसके बाद उसके जुड़वां बच्चों का गर्भपात होने की बात सामने आई। पति का कहना था कि इसके बाद पत्नी की मां उसे रायगढ़ ले गईं और उसके बार-बार प्रयास करने के बावजूद वह वापस नहीं आई। पति ने पांच नवंबर 2019 को जांजगीर के परामर्श केंद्र में संपर्क किया। उसके अनुसार, वहां उसे न्यायालय जाने की सलाह दी गई। वह 16 दिसंबर 2019 को अपने समुदाय के कुछ लोगों के साथ पत्नी को वापस लाने के लिए रायगढ़ गया, लेकिन पत्नी उसके साथ जाने के लिए तैयार नहीं हुई।
पत्नी ने भी लगाए पति पर आरोप
इसके बाद पत्नी ने पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ घरेलू हिंसा कानून के तहत कार्यवाही शुरू की, जो रायगढ़ की अदालत में लंबित बताई गई। दूसरी ओर, पत्नी ने पति के आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया कि पति के किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध थे। उसके अनुसार, इस संबंध की जानकारी होने के बाद पति शराब का सेवन करने लगा और उसके साथ दुर्व्यवहार भी करने लगा।
परिवार न्यायालय ने तलाक की मांग ठुकराई
परिवार न्यायालय के समक्ष पति ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की मांग की थी। उसने पत्नी की कथित क्रूरता और परित्याग को इसका आधार बनाया था। परिवार न्यायालय ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद पाया कि पति पत्नी की ओर से क्रूरता अथवा परित्याग को साबित करने में सफल नहीं हुआ। इसके बाद उसकी तलाक की मांग खारिज कर दी गई।
स्त्रीधन और उपहार लौटाने का निर्देश
साथ ही, पत्नी की ओर से हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 27 के तहत दायर आवेदन को स्वीकार करते हुए परिवार न्यायालय ने पति को पत्नी का स्त्रीधन और उपहार लौटाने का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ पति ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में अपील दायर की। उच्च न्यायालय ने पाया कि सुनवाई के दौरान पति ने पत्नी के खिलाफ कई आरोप लगाए, लेकिन उन्हें साबित करने के लिए कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं किया। युगल पीठ ने विशेष रूप से उस आरोप का उल्लेख किया, जिसमें पति ने कहा था कि पत्नी उसे उसके 'काले रंग' और 'मोटे शरीर' को लेकर संबोधित करती थी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मामले की परिस्थितियों में इस तरह के कथित संबोधन को अकेले तलाक देने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
‘आरोप अधिक होने से वे साबित नहीं होते’
अदालत ने कहा कि केवल आरोपों की संख्या अधिक होने से वे प्रमाणित नहीं हो जाते। किसी आरोप को विवाह-विच्छेद का आधार बनाने के लिए उसके समर्थन में ठोस साक्ष्य होना आवश्यक है। पति ने यह भी दावा किया था कि पत्नी दिसंबर 2019 से उससे अलग रह रही है और बिना किसी उचित कारण के घर वापस नहीं लौटी। इस संबंध में न्यायालय ने पाया कि पति यह साबित नहीं कर सका कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के अपने माता-पिता के घर रह रही थी।
हाईकोर्ट ने अपील खारिज की
उच्च न्यायालय की युगल पीठ ने कहा कि पति की ओर से पत्नी के खिलाफ लगाए गए अनेक आरोप ठोस और निर्णायक साक्ष्य से प्रमाणित नहीं हुए हैं। इसी तरह, पत्नी द्वारा वैवाहिक संबंध का परित्याग करने की आवश्यक मंशा भी पति साबित नहीं कर सका। न्यायालय ने माना कि परिवार न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों का न्यायोचित मूल्यांकन करते हुए पति की विवाह-विच्छेद की मांग खारिज की थी। इसलिए उसके फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता।
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