चंडीगढ़ पर बिल को लेकर भगवंत और मोदी सरकार में तकरार
चंडीगढ़ पर बिल को लेकर भगवंत और मोदी सरकार में तकरार
केन्द्र की आर्टिकल 240 के जरिये चंडीगढ़ पर नियंत्रण की पहल
आप, कांग्रेस व अकाली दल के विरोध के बाद केन्द्र ने कदम पीछे खींचे
नई दिल्ली। केन्द्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ को लेकर नरेन्द्र मोदी सरकार और पंजाब की भगवंत सिंह सरकार आमने सामने हैं। यह टकराव केन्द्र सरकार द्वारा संसद के आगामी सत्र में एक संविधान संशोधन विधेयक पेश करने की योजना को लेकर शुरू हुआ है। इस विधेयक में राष्ट्रपति को चंडीगढ़ के लिए सीधे नियम-कानून बनाने का अधिकार देने का प्रावधान किया गया है। हालांकि, पंजाब में राजनीतिक विरोध के बाद केंद्र ने फिलहाल अपने कदम पीछे खींच लिये हैं।
संसद के आगामी सत्र को लेकर लोकसभा और राज्यसभा के बुलेटिन में एक दिसंबर से शुरू होने वाले सत्र के लिए 10 विधेयकों की अनंतिम सूची में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2025 शामिल किए जाने की जानकारी दी गयी थी। इस विधेयक में चंडीगढ़ को संविधान के अनुच्छेद 240 के दायरे में लाने का प्रस्ताव है। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति को केंद्र शासित प्रदेश के लिए नियम बनाने और सीधे कानून बनाने का अधिकार देता है। अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप, दादरा एवं नगर हवेली तथा दमन और दीव, तथा पुडुचेरी (जब इनकी विधानसभा भंग या निलंबित हो) जैसे अन्य बिना विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेश प्ले से ही आर्टिकल 240 में शामिल हैं।
इस बुलेटिन को लेकर पंजाब के नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। अब पंजाब में भारी विरोध के बाद केन्द्र सरकार ने अपने कदम पीछे खींच लिये है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रविवार को स्पष्ट किया कि संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में केंद्र के लिए कानून निर्माण की प्रक्रिया को सरल बनाने से जुड़े चंडीगढ़ संबंधी प्रस्तावित विधेयक को लाने का सरकार का कोई इरादा नहीं है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि इस प्रस्ताव का उद्देश्य चंडीगढ़ और पंजाब एवं हरियाणा के बीच चल रही पारंपरिक व्यवस्थाओं में किसी भी प्रकार का बदलाव करना नहीं है।
गृह मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, "चंडीगढ़ के हितों को ध्यान में रखते हुए सभी हितधारकों से उचित परामर्श के बाद ही कोई उपयुक्त निर्णय लिया जाएगा। किसी भी तरह की चिंता की जरूरत नहीं है। केंद्र सरकार का संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में इस संबंध में कोई विधेयक लाने का इरादा नहीं है।" मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने कहा कि चंडीगढ़ के लिए कानून निर्माण प्रक्रिया को सरल बनाने का प्रस्ताव अभी भी विचाराधीन है और इस पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
AAP नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने कहा कि केंद्र सरकार पंजाब की राजधानी छीनने की साजिश कर रही है। मान ने एक बयान में कहा, "चंडीगढ़ पहले भी पंजाब का अभिन्न हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा। कोई भी व्यक्ति या संस्था इससे इनकार नहीं कर सकता कि मातृ राज्य होने के नाते पंजाब का अपनी राजधानी चंडीगढ़ पर पूरा अधिकार है।" कांग्रेस की पंजाब इकाई के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने इस कदम को पूरी तरह अनावश्यक बताया। साथ ही पंजाब से चंडीगढ़ छीनने के खिलाफ चेतावनी दी। अकाली दल ने भी इस बिल को लेकर अपना विरोध दर्ज कराया है।
मालूम हो कि चंडीगढ़ अभी पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी है। मौजूदा समय में पंजाब के राज्यपाल ही चंडीगढ़ केंद्र शासित प्रदेश के एडमिनिस्ट्रेटर होते हैं। हालांकि एक नवंबर 1966 को जब पंजाब का पुनर्गठन हुआ था, तब चंडीगढ़ का एडमिनिस्ट्रेशन स्वतंत्र रूप से मुख्य सचिव द्वारा किया जाता था। पर इस व्यवस्था में बदलाव के बाद एक जून 1984 से चंडीगढ़ का प्रशासन पंजाब के राज्यपाल द्वारा किया जा रहा है। मुख्य सचिव का पद केंद्र शासित प्रदेश के एडमिनिस्ट्रेटर के सलाहकार में परिवर्तित कर दिया गया था। अगस्त 2016 में केंद्र ने पुरानी व्यवस्था बहाल करने की कोशिश और इंडिपेंडेंट एडमिनिस्ट्रेटर के रूप में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के पूर्व अधिकारी केजे अल्फोंस को नियुक्त किया था। हालांकि, तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री और तब केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) में शामिल शिरोमणि अकाली दल के नेता प्रकाश सिंह बादल, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (AAP) सहित अन्य दलों के कड़े विरोध के कारण इसे अमली जामा नहीं पहनाया जा सका।
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