उत्तराखंड में 2027 चुनाव से पहले कांग्रेस-यूकेडी गठबंधन की चर्चा तेज, क्या बदलेगा चुनावी गणित?
देहरादून (उत्तराखंड)। सत्ता से लंबी दूरी किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती मानी जाती है। उत्तराखंड में कांग्रेस लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुकी है। ऐसे में 2027 का चुनाव पार्टी के लिए सिर्फ सत्ता वापसी नहीं, बल्कि राजनीतिक पुनर्स्थापना की परीक्षा भी माना जा रहा है। यही वजह है कि कांग्रेस अब अपने पुराने सहयोगियों और छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ संभावित गठबंधन की संभावनाएं तलाश रही है। चर्चा सबसे ज्यादा उत्तराखंड क्रांति दल यानी यूकेडी के साथ तालमेल की है। सवाल है कि क्या सीटों के लिहाज से शून्य पर खड़ी यूकेडी, कांग्रेस के लिए चुनावी समीकरण बदल पाएगी?
कई सीटों पर बेहद मामूली अंतर से हारी थी कांग्रेस
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कई सीटों पर बेहद मामूली अंतर से हार गई। भीमताल में हार का अंतर सिर्फ 300 वोट रहा। सोमेश्वर में 530 वोट, ज्वालापुर में करीब एक हजार, रानीखेत में दो हजार, जबकि यमकेश्वर और श्रीनगर में करीब साढ़े तीन-तीन हजार वोटों से कांग्रेस जीत से चूक गई। दूसरी ओर यूकेडी पिछले दो विधानसभा चुनावों में एक भी सीट नहीं जीत सकी। लेकिन पहाड़ की कई सीटों पर उसका परंपरागत वोट बैंक आज भी मौजूद माना जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुछ क्षेत्रों में यूकेडी के एक से चार हजार वोट करीबी मुकाबलों में निर्णायक साबित हो सकते हैं।
सीट बंटवारे को लेकर संभावित गठबंधन की चर्चाएं
इसी संभावना को देखते हुए कांग्रेस के भीतर गठबंधन के विकल्पों पर चर्चा की खबरें सामने आ रही हैं। हालांकि अभी तक दोनों दलों की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। सूत्रों के अनुसार यूकेडी लगभग 15 सीटों पर दावेदारी चाहती है। वहीं कांग्रेस सीट-दर-सीट राजनीतिक लाभ और नुकसान का आकलन कर रही है। यदि गठबंधन बनता है तो यमकेश्वर, श्रीनगर, रानीखेत, भीमताल और डीडीहाट जैसी सीटों पर चुनावी मुकाबले की तस्वीर बदल सकती है।
वोट ट्रांसफर और तालमेल तय करेंगे चुनावी असर
हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी है। किसी भी गठबंधन की सफलता केवल जोड़-घटाव से तय नहीं होती। यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि यूकेडी का वोट कांग्रेस को कितना ट्रांसफर होता है, उम्मीदवार कौन होते हैं और उस समय राज्य का राजनीतिक माहौल कैसा रहता है। राजनीतिक जानकारों का आकलन है कि यदि कांग्रेस और यूकेडी के बीच प्रभावी तालमेल बनता है और वोटों का पर्याप्त हस्तांतरण होता है तो 5 से 7 सीटों पर सीधा असर पड़ सकता है। वहीं 8 से 10 सीटों पर मुकाबला पहले की तुलना में अधिक कड़ा हो सकता है। हालांकि यह एक संभावित चुनावी परिदृश्य है न कि निश्चित चुनावी परिणाम।
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