दिल्ली हाईकोर्ट ने कथित अवैध प्रवासियों के निर्वास

अवैध प्रवासियों के निर्वासन की मांग खारिज, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका की रद्द

Delhi HC Rejects Plea Seeking Deportation of Illegal Migrants

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कालिंदी कुंज, बाटला हाउस, शाहीन बाग, श्रम विहार, तैमूर नगर और मजनू का टीला जैसे इलाकों से बांग्लादेशियों और रोहिंग्याओं सहित कथित अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि अस्पष्ट और निराधार आरोपों के आधार पर कोई व्यापक निर्देश जारी नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करना "मनमानी और अंधाधुंध जांच" का आदेश देने जैसा होगा।

सामान्य आरोपों पर अदालत ने जताई आपत्ति

न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने एम.ए. बर्नी द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि आरोप सामान्य प्रकृति के थे और किसी भी प्रथम दृष्टया साक्ष्य से समर्थित नहीं थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह निराधार आरोपों की जांच के लिए अधिकारियों को परमादेश जारी नहीं कर सकती।

याचिका में क्या थी मांग?

याचिकाकर्ता ने यमुना नदी के पास स्थित कालिंदी कुंज, बाटला हाउस, शाहीन बाग, श्रम विहार, तैमूर नगर और मजनू का टीला क्षेत्रों में कथित रूप से रह रहे अवैध प्रवासियों, जिनमें अधिकतर बांग्लादेशी और रोहिंग्या समुदाय के लोग बताए गए थे, को निर्वासित करने के निर्देश देने की मांग की थी। इसके अलावा याचिका में कथित तौर पर उन्हें शरण देने वाले स्थानीय लोगों के खिलाफ कार्रवाई और याचिकाकर्ता को पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने की भी मांग की गई थी।

पुलिस जांच में नहीं मिला कोई सबूत

प्रतिवादियों की ओर से दायर स्थिति रिपोर्ट में बताया गया कि याचिकाकर्ता ने सरिता विहार थाने में इस संबंध में कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। पुलिस ने स्थानीय स्तर पर जांच की, लेकिन संबंधित इलाकों में अवैध प्रवासियों के रहने का कोई मामला सामने नहीं आया। अधिकारियों ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता किसी भी कथित अवैध प्रवासी का नाम या अन्य विवरण उपलब्ध नहीं करा सके, जिससे सत्यापन संभव नहीं हो पाया।

पुरानी याचिकाओं और एफआईआर का भी हुआ जिक्र

प्रतिवादियों ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता द्वारा पहले दायर की गई कई याचिकाएं भी सारहीन पाए जाने पर खारिज की जा चुकी हैं। साथ ही भारतीय दंड संहिता और अन्य कानूनों के तहत याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज कई एफआईआर का भी उल्लेख किया गया।

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला

याचिका खारिज करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने मोहम्मद इस्माइल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि बिना ठोस सबूत के लगाए गए व्यापक और अस्पष्ट आरोपों के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप या व्यापक जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने भोदु शेख बनाम भारत संघ मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि नागरिकता से जुड़े मामलों का फैसला साक्ष्यों और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

निर्वासन कार्यपालिका का अधिकार: हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कादिर अहमद बनाम राज्य (दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र) मामले में अपने पूर्व फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि विदेशी नागरिकों की पहचान और उनका निर्वासन कार्यपालिका के विशेष अधिकार क्षेत्र में आता है और ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है। इन्हीं आधारों पर अदालत ने कहा कि केवल सामान्य और अप्रमाणित आरोपों के आधार पर अधिकारियों को कथित अवैध प्रवासियों की पहचान कर उन्हें निर्वासित करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। इसके साथ ही लंबित आवेदनों सहित पूरी रिट याचिका खारिज कर दी गई।

(एएनआई)

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