दिल्ली हाई कोर्ट ने ‘ब्रिंग बैक बैलेट’ इंस्टाग्राम

दिल्ली हाई कोर्ट ने ‘Bring Back Ballot’ इंस्टाग्राम अकाउंट पर रोक के खिलाफ याचिका पर केंद्र से मांगा जवाब

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नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार को भारत में इंस्टाग्राम हैंडल @bring_back__ballot को रोके जाने  को चुनौती देने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया। “ब्रिंग बैक बैलेट” पहल ‘मिशन सेव कॉन्स्टिट्यूशन’ और इसके राष्ट्रीय संयोजक, अधिवक्ता महमूद प्राचा की है। बताया गया है कि जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन से ठीक पहले, 10 अक्टूबर 2026 को इस हैंडल को रोक दिया गया था। न्यायमूर्ति अमित महाजन ने केंद्र सरकार और संबंधित विभाग को नोटिस जारी कर याचिका पर जवाब तलब किया है। इस मामले की अगली सुनवाई 6 नवंबर के लिए सूचीबद्ध की गई है।

जंतर-मंतर पर याचिकाकर्ताओं का शांतिपूर्ण प्रदर्शन

मेटा प्लेटफॉर्म्स की ओर से अधिवक्ता अमी राणा पेश हुईं और नोटिस स्वीकार किया। केंद्र सरकार की ओर से केंद्रीय सरकारी स्थायी वकील आशीष दीक्षित पेश हुए और उन्होंने गृह मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा इसके नामित अधिकारी की ओर से नोटिस स्वीकार किया। यह याचिका अधिवक्ता निखिल गुलियानी के माध्यम से दायर की गई है। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता सनावर चौधरी ने दलील दी कि 10 अक्टूबर 2026 को, जंतर-मंतर पर याचिकाकर्ताओं के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के ठीक उसी दिन, इस हैंडल पर यह संदेश दिखने लगा: “भारत में खाता उपलब्ध नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हमने इस सामग्री को प्रतिबंधित करने के एक कानूनी अनुरोध का पालन किया है।”

भारतीय चुनावों में पेपर बैलेट की वापसी की वकालत

याचिका में कहा गया है, "याचिकाकर्ताओं को कभी भी कोई नोटिस, सुनवाई का मौका, कारण या किसी आदेश की प्रति नहीं दी गई।" याचिका में कहा गया है कि यह हैंडल “ईवीएम हटाओ देश बचाओ” नारे के तहत भारतीय चुनावों में पेपर बैलेट की वापसी की वकालत करता है और नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर 10 अक्टूबर 2026 को होने वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए नागरिकों को एकजुट करता है, जिसकी पूर्व सूचना 9 अक्टूबर 2026 को दिल्ली पुलिस को दे दी गई थी।

मतदान के तरीके में बदलाव की वकालत मुख्य राजनीतिक भाषण

याचिका के अनुसार, मतदान के तरीके में बदलाव की वकालत करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत संरक्षित एक मुख्य राजनीतिक भाषण है। हैंडल पर मौजूद कोई भी सामग्री संविधान के अनुच्छेद 19(2) या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69(1) के तहत किसी भी आधार के दायरे में नहीं आती है। याचिकाकर्ता ने कहा कि यह प्रतिबंध उक्त नियमों के नियम 8 द्वारा अनिवार्य नोटिस और सुनवाई के बिना लगाया गया था। 

किसी विशिष्ट पोस्ट के बजाय पूरे अकाउंट को ही रोका

याचिका में कहा गया है कि इसमें किसी विशिष्ट पोस्ट के बजाय पूरे अकाउंट को ही रोक दिया गया है, जिसके 50,000 से अधिक फॉलोअर्स हैं, और इसलिए यह कार्रवाई असंगत है। यह तर्कहीन है और इसके बारे में कभी सूचित नहीं किया गया, जिससे याचिकाकर्ता कानूनी उपायों से वंचित हो गए। याचिका में आगे कहा गया है कि कोई भी ऐसी प्रकाशित नीति, मानक संचालन प्रक्रिया या दिशानिर्देश मौजूद नहीं हैं जो यह तय करते हों कि प्रतिवादी इंस्टाग्राम और अन्य मध्यस्थों को पूरे खातों को रोकने का निर्देश कब और कैसे देते हैं। याचिका में कहा गया, "मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध किसी ऐसी अघोषित नीति के तहत नहीं लगाए जा सकते, जो अनुच्छेद 19(2) के अर्थ में 'कानून' नहीं है।"

(इनपुटः ANI)

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