उत्तराखंड के वसुंधरा ताल में ग्लेशियल झीलों से जुड

वसुंधरा ताल में लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम, ग्लेशियल झीलों की निगरानी को मिलेगी तकनीकी मजबूती

Early Warning System to Be Installed at Vasundhara Tal in Uttarakhand

देहरादून (उत्तराखंड)। उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों से जुड़े संभावित ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) के खतरे को कम करने के लिए बड़ा कदम उठाया गया है। चमोली स्थित वसुंधरा ताल में पहली बार अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जा रहा है। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। सीबीआरआई और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के विशेषज्ञ अत्याधुनिक सेंसर, उपग्रह संचार और रियल-टाइम मॉनिटरिंग के जरिए झील की निगरानी करेंगे, जिससे संभावित खतरे की समय रहते पहचान और चेतावनी देने में मदद मिलेगी।

सीबीआरआई और वाडिया के विशेषज्ञ करेंगे स्थापना

यह उत्तराखंड की एक ग्लेशियल झील में निगरानी एवं पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने के लिए जाने वाला पहला वैज्ञानिक दल है। अभियान उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण द्वारा राष्ट्रीय ग्लेशियल लेक आउटबस्र्ट फ्लड जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के अंतर्गत संचालित किया जा रहा है। दल में केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की और वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिक एवं तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं। उच्च हिमालयी और दुर्गम क्षेत्र में सुरक्षा, आवागमन एवं फील्ड सहयोग के लिए SDRF, NDRF और ITBP के जवान भी दल के साथ रहेंगे।

सैटेलाइट फोन और लो अर्थ ऑर्बिट डिवाइस से संचार

अभियान के लिए आवश्यक समन्वय और लॉजिस्टिक सहायता USDMA द्वारा उपलब्ध कराई जा रही है। टीम को सैटेलाइट फोन और लो अर्थ ऑर्बिट डिवाइस भी उपलब्ध कराए गए हैं, ताकि मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में टीम का संचार और USDMA के साथ समन्वय बना रहे। इस अवसर पर सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन, अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रशासन प्रकाश चंद्र, अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी क्रियान्वयन एवं DIG राजकुमार नेगी, कमांडेंट SDRF अर्पण यदुवंशी, निदेशक CBRI आर. प्रदीप कुमार समेत संबंधित विभागों एवं संस्थानों के अधिकारी और वैज्ञानिक मौजूद रहे।

इन उपकरणों से होगी वसुंधरा ताल की निगरानी

वसुंधरा ताल में स्थापित की जाने वाली प्रणाली में जलस्तर सेंसर, स्वचालित मौसम केंद्र, स्नो डेप्थ सेंसर, स्नो सब सरफेस टेंपरेचर सेंसर, टिल्ट एवं एक्सेलेरोमीटर सेंसर, जल प्रवाह सेंसर और सौर ऊर्जा प्रणाली शामिल हैं। इनके माध्यम से झील के जलस्तर, मौसम, बर्फ की स्थिति, झुकाव, कंपन, हलचल और जल प्रवाह में होने वाले बदलावों की निगरानी की जाएगी। उपग्रह संचार प्रणाली मोबाइल नेटवर्क नहीं होने की स्थिति में आंकड़ों को बेस स्टेशन तक भेजने में मदद करेगी। डेटा लॉगर एवं मॉनिटरिंग डैशबोर्ड के जरिए प्राप्त आंकड़ों का रिकॉर्ड, ऑनलाइन प्रदर्शन और निर्धारित थ्रेशोल्ड के आधार पर अलर्ट जनरेशन की व्यवस्था होगी।

तकनीकी आंकड़ों से होगा जोखिम का आकलन

इस प्रणाली के माध्यम से वसुंधरा ताल और आसपास के पर्यावरणीय एवं जलवैज्ञानिक बदलावों की लगातार निगरानी की जा सकेगी। सेंसरों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर संभावित असामान्य बदलावों की पहचान करने और समय रहते संबंधित तंत्र को अलर्ट उपलब्ध कराने में सहायता मिलेगी। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन ने कहा कि उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक निगरानी और आधुनिक पूर्व चेतावनी प्रणालियों की स्थापना से राज्य की आपदा पूर्व तैयारी मजबूत होगी। वसुंधरा ताल की यह पहल भविष्य में अन्य संवेदनशील ग्लेशियल झीलों में ऐसी प्रणालियां स्थापित करने के लिए आधार तैयार करेगी।

अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करना प्राथमिकता: कौशिक

आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री मदन कौशिक ने कहा कि उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक निगरानी को मजबूत करना राज्य सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। उन्होंने कहा कि वसुंधरा ताल से अर्ली वार्निंग सिस्टम की शुरुआत ग्लेशियल झीलों से जुड़े जोखिमों की निगरानी के लिए महत्वपूर्ण पहल है।

उन्होंने बताया कि प्रणाली के माध्यम से जलस्तर, मौसम, हिम की स्थिति, जल प्रवाह और अन्य महत्वपूर्ण मानकों से संबंधित आंकड़े लगातार प्राप्त किए जा सकेंगे। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक विशेषज्ञता के माध्यम से आपदा जोखिम को न्यूनतम करने तथा उच्च हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा मजबूत करने का प्रयास कर रही है।

उत्तराखंड में 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित

सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन के अनुसार, राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (NRSC) के वर्ष 2023 के आंकड़ों के आधार पर उत्तराखंड में कुल 344 ग्लेशियल झीलें चिह्नित की गई हैं। इनमें से राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) एवं तकनीकी संस्थाओं ने 13 ग्लेशियल झीलों को उच्च जोखिम वाली झीलों के रूप में चिन्हित किया है। इनमें बागेश्वर की 01, चमोली की 04, पिथौरागढ़ की 06, टिहरी गढ़वाल की 01 और उत्तरकाशी की 01 झील शामिल हैं। राज्य सरकार इन झीलों की स्थिति और संभावित GLOF जोखिम को लेकर वैज्ञानिक अध्ययन एवं निगरानी कर रही है।

छह झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण पूरा

विनोद कुमार सुमन ने बताया कि उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की वैज्ञानिक एवं तकनीकी जांच के तहत 06 झीलों का बाथीमेट्रिक सर्वेक्षण पूरा किया जा चुका है। इनमें चमोली की सरस्वती ताल और वसुंधरा ताल, उत्तरकाशी की केदारताल तथा पिथौरागढ़ की दारमा घाटी स्थित मबांग, प्यूनग्रू और स्युंक्ति यांक्ति प्रोग्लेशियल झीलें शामिल हैं। सर्वेक्षण के माध्यम से झीलों की गहराई, जलधारण क्षमता और अन्य महत्वपूर्ण जलवैज्ञानिक आंकड़े जुटाए गए हैं। इन आंकड़ों के आधार पर संभावित GLOF जोखिम का वैज्ञानिक आकलन और आवश्यक आपदा प्रबंधन तैयारियों को मजबूत किया जाएगा।

निचले क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए पूर्व तैयारी पर जोर

सचिव ने कहा कि ग्लेशियल झीलों की निगरानी के लिए राज्य स्तर पर संबंधित केंद्रीय एवं तकनीकी संस्थाओं के साथ समन्वय स्थापित किया गया है। झीलों में जलस्तर, आकार में बदलाव और अन्य संभावित जोखिमों की नियमित निगरानी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि संभावित GLOF घटनाओं से निचले क्षेत्रों की बस्तियों, सड़कों, पुलों, जलविद्युत परियोजनाओं और अन्य महत्वपूर्ण अवस्थापना को संभावित खतरे को देखते हुए पूर्व तैयारी और समयबद्ध चेतावनी व्यवस्था को मजबूत किया जा रहा है। राज्य सरकार का उद्देश्य वैज्ञानिक आंकड़ों के आधार पर जोखिम की पहचान कर प्रभावित क्षेत्रों में समय रहते आवश्यक सुरक्षा एवं बचाव कार्रवाई सुनिश्चित करना है।

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