खजुराहो की कामुक मूर्तियां महज पत्थर की संरचना नहीं, इनमें 'कुंडलिनी जागरण' का रहस्य
खजुराहो। खजुराहो के मंदिर केवल पत्थर की संरचनाएँ नहीं हैं, बल्कि ये भारतीय स्थापत्य कला और गहरे आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक हैं। चंदेल वंश के राजाओं द्वारा 9वीं से 11वीं शताब्दी के बीच निर्मित ये मंदिर सदियों से शोधकर्ताओं और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रहे हैं।
कुंडलिनी जागरण की प्रक्रिया को दर्शाती है
कई आध्यात्मिक विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का मानना है कि मंदिर की बाहरी दीवारों पर बनी कामुक मूर्तियाँ महज अश्लीलता नहीं हैं, बल्कि ये मनुष्य के शरीर में स्थित 'कुंडलिनी ऊर्जा' के जागरण की प्रक्रिया को दर्शाती हैं।
कामुकता सांसारिक जीवन का अहम अंग
इस विचारधारा के अनुसार, कामुकता या सांसारिक सुख मानव जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। मंदिर के बाहर इन मूर्तियों को इसलिए रखा गया, ताकि भक्त अपनी भौतिक इच्छाओं को मंदिर के बाहर ही छोड़ दे और गर्भगृह में प्रवेश करते समय पूरी तरह से आध्यात्मिक हो जाए।
भोग से योग की ओर जाने का मार्ग
यह मूर्तियाँ दर्शाती हैं कि यदि कोई व्यक्ति अपनी इंद्रियों और कामुकता पर विजय प्राप्त कर लेता है, तो वह उच्च आध्यात्मिक अवस्था (कुंडलिनी जागरण) को प्राप्त कर सकता है। यह 'भोग' से 'योग' की ओर जाने का एक मार्ग है।
खजुराहो में कई और मान्यताएं प्रचलित
हालांकि 'कुंडलिनी' का सिद्धांत एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक दृष्टिकोण है, लेकिन खजुराहो की इन मूर्तियों के पीछे कई अन्य सिद्धांत भी दिए जाते हैं। कुछ विद्वानों का कहना है कि ये मूर्तियाँ उस समय के जीवन का यथार्थ चित्रण हैं, जिसमें प्रेम, नृत्य, युद्ध और दैनिक जीवन के हर पहलू को शामिल किया गया है। एक मान्यता यह भी है कि ये मूर्तियाँ भक्त की परीक्षा लेती हैं। मंदिर में प्रवेश करने से पहले, भक्त को अपनी कामुकता और सांसारिक विकारों का त्याग करना होता है, जो इन मूर्तियों को देखकर उसे खुद का आकलन करने में मदद करती हैं।
खजुराहो के मंदिरों का निर्माण तांत्रिक संप्रदायों के प्रभाव में हुआ माना जाता है, जहाँ काम-कला को मोक्ष प्राप्ति के एक माध्यम के रूप में भी देखा जाता रहा है।
चार पुरूषार्थ का संतुलन ही जीवन है
खजुराहो का रहस्य केवल मूर्तियों की सुंदरता तक सीमित नहीं है। यह मंदिर परिसर हमें यह सिखाता है कि भारतीय संस्कृति में 'काम' (इच्छा), 'अर्थ' (संपत्ति), 'धर्म' (कर्तव्य) और 'मोक्ष' (मुक्ति) — इन चार पुरुषार्थों का संतुलन ही जीवन है। खजुराहो का हर कोना, चाहे वह कामुक मूर्तियाँ हों या देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ, जीवन के विभिन्न आयामों को समाहित किए हुए है।
चंदेल राजवंश और खजुराहो का इतिहास
खजुराहो के मंदिरों का निर्माण 950 ईस्वी से 1050 ईस्वी के बीच मध्य भारत के चंदेल राजवंश के राजाओं द्वारा करवाया गया था। यह चंदेलों के शासनकाल का स्वर्ण युग था। ये मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं थे, बल्कि चंदेल राजाओं की राजनीतिक शक्ति, समृद्धि और धार्मिक उदारता के प्रतीक थे।
इनके राजा यशोवर्मन, धंग देव और विद्याधर जैसे राजाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने भगवान विष्णु, शिव और जैन तीर्थंकरों को समर्पित भव्य मंदिरों का निर्माण कराया। खजुराहो में कभी 85 मंदिर हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ प्राकृतिक आपदाओं और बाहरी आक्रमणों के कारण अब केवल 20-25 मंदिर ही शेष बचे हैं।
नागर शैली में निर्माण
खजुराहो के मंदिर उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला की 'नागर शैली' के सबसे बेहतरीन उदाहरण माने जाते हैं। इस शैली में पंचायतन शैली (Panchayatana Style) है। यहां अधिकांश मंदिर 'पंचायतन' शैली में बने हैं। इसका अर्थ है कि एक मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर चार छोटे सहायक मंदिर होते हैं, जो एक ऊँचे चबूतरे (जगत) पर स्थित होते हैं। नागर शैली की मुख्य पहचान ऊँचे और घुमावदार 'शिखर' (Spire) हैं, जो पर्वत (विशेषकर मेरु पर्वत) का प्रतीक माने जाते हैं। कंदरिया महादेव मंदिर का शिखर इसका सबसे भव्य उदाहरण है।
मंदिरों का विन्यास आमतौर पर एक ही अक्ष पर होता है। प्रवेश द्वार से भक्त प्रवेश करते हैं। मंडप (Mandapa) में भक्त एकत्रित होते हैं। अंतराल (Antarala) मंडप और गर्भगृह के बीच का स्थान है। गर्भगृह (Garbhagriha) मंदिर का सबसे पवित्र हिस्सा जहाँ मुख्य देवता की मूर्ति स्थापित होती है।
वास्तुकला की बारीकियाँ
इन मंदिरों का निर्माण प्राचीन भारतीय 'शिल्प शास्त्र' के नियमों के अनुसार किया गया है। हर मूर्ति और नक्काशी का अपना एक निश्चित स्थान है। इन मंदिरों को बनाने के लिए बलुआ पत्थर का उपयोग किया गया है, जिस पर इतनी सूक्ष्म नक्काशी की गई है कि पत्थर ऐसा लगता है जैसे रेशम पर चित्रकारी की गई हो। मंदिर की संरचना में ऊर्ध्वाधर (Vertical) लाइनों का उपयोग इसे बहुत ऊँचा और भव्य दिखाता है। खजुराहो की वास्तुकला न केवल सुंदरता के लिए, बल्कि इंजीनियरिंग की उस समय की समझ को भी दर्शाती है, जहाँ बिना किसी सीमेंट या मोर्टार के पत्थरों को एक-दूसरे के साथ लॉक (Interlocking) करके टिकाया गया है।
कंदरिया महादेव मंदिर खजुराहो का सबसे विशाल, अलंकृत और वास्तुकला की दृष्टि से सबसे परिष्कृत मंदिर है। इसे चंदेल स्थापत्य कला का चरमोत्कर्ष माना जाता है। 11वीं शताब्दी (लगभग 1025-1050 ईस्वी) में राजा विद्याधर द्वारा निर्मित यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है।
भव्य वास्तुकला और शिखर
इस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण इसका ऊँचा शिखर है। इसे 'मेरु पर्वत' का प्रतीक माना जाता है। मुख्य शिखर के चारों ओर 84 छोटे-छोटे उप-शिखर हैं, जो इसे एक हिमालय जैसी पर्वत श्रृंखला का दृश्य प्रदान करते हैं। यह मंदिर लगभग 31 मीटर (100 फीट से अधिक) ऊँचा है। इसे एक ऊँचे चबूतरे (जगती) पर बनाया गया है, जो इसकी भव्यता को और बढ़ा देता है।
मूर्तिकला का अद्भुत संसार
कंदरिया महादेव मंदिर अपनी मूर्तिकला की सघनता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इस मंदिर के बाहरी और आंतरिक दीवारों पर लगभग 800 से अधिक मूर्तियाँ उकेरी गई हैं। ये मूर्तियाँ केवल कामुक नहीं हैं, बल्कि इनमें देवताओं, अप्सराओं, संगीतकारों, नर्तकियों, युद्ध के दृश्यों और दैनिक जीवन की गतिविधियों का चित्रण है। यहाँ की नक्काशी इतनी बारीकी से की गई है कि मूर्तियों के आभूषण, चेहरे के हाव-भाव और वस्त्रों की सिलवटें भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। हर मूर्ति अपने आप में एक कहानी कहती है।
मंदिर का विन्यास (Layout)
मंदिर का आंतरिक विन्यास पूर्णतः सममित (Symmetrical) है, जो वास्तुशास्त्र के सिद्धांतों का पालन करता है। इमसें एक भव्य तोरण द्वार से प्रवेश होता है। इसमें अर्ध-मंडप, मंडप, महामंडप और अंतराल की श्रृंखला है, जो गर्भगृह की ओर ले जाती है। मुख्य गर्भगृह में एक भव्य शिव लिंग स्थापित है। बाहरी हिस्सों की तुलना में गर्भगृह का आंतरिक भाग सादगीपूर्ण है, ताकि भक्त का ध्यान केवल ईश्वर पर केंद्रित रहे।
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