राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख और बिहार के पूर्व म

Lalu Yadav Bail: लालू यादव की जमानत पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, झारखंड हाईकोर्ट को दिए ये आदेश

RJD Chief Lalu Prasad Yadav (File Photo)

नई दिल्ली। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाला मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने झारखंड हाईकोर्ट द्वारा लालू यादव की सजा निलंबित करने और उन्हें जमानत देने के फैसले को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया है। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की याचिका का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट को इस मामले से जुड़ी लंबित अपीलों पर छह महीने के भीतर तेजी से सुनवाई करने का निर्देश दिया है।

चारा घोटाला और लालू यादव की जमानत: पूरा घटनाक्रम

  • 1991-1994: बिहार के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल के दौरान देवघर कोषागार से ₹89 लाख की अवैध निकासी का मामला सामने आया।
  • 2018: आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव को देवघर कोषागार से जुड़े चारा घोटाला मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत 7-7 साल (कुल 14 वर्ष) की जेल की सजा सुनाई गई।
  • 2019: लालू यादव द्वारा जेल में अपनी आधी सजा (Half Term) पूरी कर लेने के आधार पर झारखंड हाईकोर्ट ने उनके स्वास्थ्य और तकनीकी आधारों को देखते हुए जमानत मंजूर की थी।
  • सीबीआई की चुनौती: झारखंड हाईकोर्ट के इसी फैसले के खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का रुख कर लालू यादव की जमानत रद्द करने की मांग की थी, जिसे अब शीर्ष अदालत ने खारिज कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: 'अपील 2018 की है, 6 महीने में पूरी हो सुनवाई'

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने आदेश लिखवाते हुए स्पष्ट किया कि, "हम इस विवादित आदेश में हस्तक्षेप करने के इच्छुक नहीं हैं। यह अपील वर्ष 2018 की है। ऐसे में हाईकोर्ट से यह अनुरोध करना ही उचित होगा कि वह अपील पर सुनवाई में तेजी लाए और प्राथमिकता के आधार पर इसे छह महीने के भीतर पूरा करे। इस याचिका का निपटारा किया जाता है (Disposed of)। कानूनी मुद्दा खुला रखा गया है।"

सीबीआई की दलील: 'सजा की गणना में हाईकोर्ट से हुई चूक'

सीबीआई की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एसवी राजू ने कोर्ट के सामने दलील दी कि पूर्व में दो मौकों पर लालू यादव की सजा निलंबित करने की याचिका को योग्यता (Merits) के आधार पर खारिज किया जा चुका था। उन्होंने कहा कि लालू यादव की सजा को निलंबित करने का हाईकोर्ट का फैसला तथ्यात्मक रूप से सही नहीं था।

एएसजी ने अदालत में कहा, "मुख्य मुद्दा यह है कि हाईकोर्ट ने बाद में इस आधार पर जमानत दे दी कि उन्होंने 50 प्रतिशत सजा पूरी कर ली है, जो कि तथ्यात्मक रूप से गलत है। इस तथ्य पर विचार किए बिना कि यह कोई समवर्ती (Concurrent) सजा नहीं है, कोर्ट ने सजा को निलंबित कर उन्हें जमानत दे दी। ऐसा नहीं किया जा सकता। इसके लिए जो पैमाना अपनाया गया, वह गलत है। उन्होंने (लालू यादव) मुकदमे में भी देरी की है।"

बचाव पक्ष का पलटवार: 'जज ने समान कानूनी पैमाने का इस्तेमाल किया'

लालू प्रसाद यादव की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने सीबीआई की दलीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया। उन्होंने तर्क दिया कि सजा काटने की अवधि को लेकर जांच एजेंसी का गणित और व्याख्या दोनों ही दोषपूर्ण हैं। कपिल सिब्बल ने पीठ के समक्ष कहा, "यह पूरी दलील ही पूरी तरह से गलत है कि उन्हें पहले पहली सजा काटनी चाहिए थी और फिर दूसरी सजा। माननीय न्यायाधीश ने एक समान पैमाने का इस्तेमाल किया है। यह पूरी तरह से न्यायाधीश के विशेषाधिकार (Discretion) का मामला है।"

उल्लेखनीय है कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को उनके कार्यकाल के दौरान चाईबासा, देवघर, दुमका और डोरंडा कोषागारों से धोखाधड़ी से पैसे निकालने से जुड़े कुल पांच चारा घोटाला मामलों में दोषी ठहराया जा चुका है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से राजद खेमे और लालू यादव को बड़ी कानूनी राहत मिल गई है।

प्रभाव विश्लेषण (Impact Analysis) प्रश्न 1: सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का लालू प्रसाद यादव पर क्या सीधा असर होगा? उत्तर: इस फैसले के बाद लालू प्रसाद यादव जेल जाने से बच गए हैं और वे जमानत पर बाहर रहेंगे। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट को 6 महीने के भीतर अपीलों पर अंतिम सुनवाई पूरी करने का निर्देश दिया है, जिससे इस मामले का अंतिम कानूनी फैसला अब जल्द सामने आ सकता है।

प्रश्न 2: सीबीआई और बचाव पक्ष के बीच 'सजा की अवधि' (Half Sentence) को लेकर क्या विवाद था? उत्तर: सीबीआई का तर्क था कि लालू यादव को अलग-अलग धाराओं में 7-7 साल की सजा मिली थी, जो एक के बाद एक (Consecutive) चलनी थी, न कि एक साथ (Concurrent)। सीबीआई के अनुसार, हाईकोर्ट ने कुल 14 साल की अवधि के हिसाब से आधी सजा की गणना गलत की। वहीं, कपिल सिब्बल ने दलील दी कि कोर्ट को अपनी विवेकाधीन शक्ति के तहत एक समान पैमाना लागू करने का पूरा अधिकार है। ​(भाषांतर: Ravi Pandey | इनपुट: ANI)

यह भी पढ़ें: लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेस-वे का उद्घाटन: 30-35 मिनट में सफर, यूपी को मिली हाई-स्पीड कनेक्टिविटी की नई सौगात