कान्हा में 6 बाघों की मौत के बाद बड़े स्तर पर वैक्सीनेशन, प्रदेश के टाइगर रिजर्व में अलर्ट जारी
बालाघाट। कान्हा टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेम्पर (सीडी) वायरस के कारण 6 बाघों की मौत के बाद वन विभाग ने पूरे मध्य प्रदेश में हाई अलर्ट जारी कर दिया है। जांच में मृत बाघों के फेफड़ों में गंभीर संक्रमण और सांस लेने में तकलीफ के लक्षण पाए गए थे। कान्हा में बीती 17 से 29 अप्रैल के बीच एक बाघिन और उसके 4 शावकों की मौत हुई थी, जिसके बाद 19 मई को एक और नर बाघ की मौत हो गई।
कुत्तों का बड़े पैमाने पर टीकाकरण
संक्रमण को और फैलने से रोकने के लिए मध्य प्रदेश के सभी 9 टाइगर रिजर्व के बफर जोन और आसपास के गांवों में रहने वाले कुत्तों का बड़े स्तर पर वैक्सिनेशन (टीकाकरण) शुरू कर दिया गया है। टीका लगाए गए कुत्तों की पहचान के लिए उनके सिर पर स्थाई नीला निशान लगाया जा जा रहा है, ताकि कोई भी कुत्ता बिना टीकाकरण के न छूटे।
अभियान का दायरा बढ़ा
पेंच और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के आसपास के 10 किलोमीटर के दायरे वाले गांवों में यह अभियान पहले ही शुरू हो चुका है। अब इसे राज्य के उन सभी टाइगर रिजर्व और वाइल्ड लाइफ सेंचुरी तक बढ़ाया जा रहा है, जहां बाघ और तेंदुओं का निवास स्थान है।
एनटीसीए ने जारी किया रिजर्व के लिए नई गाइडलाइन
कान्हा नेशनल पार्क की इस गंभीर स्थिति पर संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने देश के सभी बाघ आवास वाले क्षेत्रों (टाइगर रिजर्व) के लिए नई गाइडलाइन और दिशा-निर्देश जारी किए हैं। PCCOF वाइल्डलाइफ समिता राजोरा के अनुसार सुरक्षा और निगरानी के कड़े इंतजाम किए जा रहे हैं।
इधर, बीमारी से पीड़ित मादा तेंदुआ अब पूरी तरह से हुई स्वस्थ
जबलपुर में पिछले दो महीनों से वेटरनरी विश्वविद्यालय के 'स्कूल ऑफ वाइल्डलाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ' में उपचाराधीन एक मादा तेंदुआ अब पूरी तरह से स्वस्थ हो चुकी है। इस मादा तेंदुआ को नरसिंहपुर के करेली वन परिक्षेत्र से बेहद गंभीर और नाजुक स्थिति में रेस्क्यू किया गया था, जिसके बाद इलाज के लिए इसे जबलपुर लाया गया था।
जानलेवा बीमारी की हुई थी पुष्टि
जांच के दौरान पता चला था कि मादा तेंदुआ 'कैनाइन डिस्टेम्पर' (Canine Distemper) नाम की एक अत्यंत खतरनाक और जानलेवा बीमारी से पीड़ित थी। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह मूल रूप से कुत्तों में होने वाली एक बेहद गंभीर और संक्रामक बीमारी है, जो वायरस (विषाणु) के कारण फैलती है।
सख्त प्रोटोकॉल और निगरानी में रखा गया
संस्थान की डायरेक्टर डॉ. शोभा जावरे ने बताया कि कैनाइन डिस्टेम्पर एक बेहद संवेदनशील बीमारी है। इसमें इलाज के बाद भी वन्यजीवों के लिए 3 महीनों का सख्त प्रोटोकॉल मेंटेन करना अनिवार्य होता है। एहतियात के तौर पर मादा तेंदुआ को अभी 1 महीना और कड़ी निगरानी में रखा जाएगा।
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