सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल

पूर्व SC जज जस्टिस संजय करोल बोले- UCC समय की जरूरत, देशभर में एक केंद्रीय कानून होना चाहिए

Former SC Judge Sanjay Karol Backs UCC as Need of the Hour

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल ने बुधवार को कहा कि कानूनों में एकरूपता लाने के लिए समान नागरिक संहिता (UCC) समय की जरूरत है। उन्होंने माना कि इस मुद्दे पर अलग-अलग विचार हो सकते हैं, लेकिन देश में एक केंद्रीय नागरिक संहिता होनी चाहिए। जस्टिस करोल नई दिल्ली में संविधान के अनुच्छेद 44 और UCC पर आयोजित नेशनल लीगल डायलॉग में बोल रहे थे। इस कार्यक्रम का आयोजन भारत कलेक्टिव फाउंडेशन नाम के संगठन ने किया था।

जस्टिस करोल ने केंद्रीय कानून की जरूरत पर दिया जोर

जस्टिस करोल ने बिहार में सामाजिक समरसता और धर्मनिरपेक्षता की सराहना की। उन्होंने कहा, “अगर आप धर्मनिरपेक्षता या अनुच्छेद 44 को देखना चाहते हैं, तो आपको बिहार जरूर आना चाहिए। हर समुदाय के लोग अपनी जाति से परे छठ पूजा पर पूजा करते हैं।” उन्होंने पूरे देश में एक समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत पर भी जोर दिया। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अलग-अलग राज्य अपने-अपने स्तर पर अलग कानून लागू कर सकते हैं। उनके अनुसार, इस विषय पर देशव्यापी केंद्रीय कानून की जरूरत है।

राज्यसभा सांसद सुजीत कुमार ने भी रखे विचार

कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद सुजीत कुमार ने भी UCC पर अपने विचार साझा किए। वह कार्मिक, जन शिकायत, कानून और न्याय संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अध्यक्ष हैं। इसके अलावा, उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता के मसौदे और नियम बनाने वाली समिति के सदस्य मनु गौर ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया। उत्तराखंड UCC लागू करने वाला राज्य है। मनु गौर ने कहा, “हमारे धर्म अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन आजादी के बाद हम सब भारतीय हैं। अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की नीति के जरिए भारत पर शासन करने के लिए धर्म और जाति का इस्तेमाल किया।” उन्होंने यह भी दावा किया कि अंग्रेजों ने अपनी इस नीति के तहत हिंदुओं और मुसलमानों को अलग करने के लिए शरिया कानून लागू किया। गौर ने विवाह की अवधारणा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि हिंदू धर्म में विवाह एक संस्कार है, जबकि कुछ अन्य धर्मों में इसे अनुबंध के रूप में देखा जाता है। उन्होंने कहा कि अनुबंध समाप्त किया जा सकता है, लेकिन संस्कार नहीं।

शाह बानो और सौरभ बानो मामलों का किया जिक्र

अपने भाषण में गौर ने UCC की जरूरत पर जोर देने के लिए शाह बानो और सौरभ बानो मामलों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन मामलों से मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मुद्दे सामने आए। उन्होंने दावा किया कि ये मामले उत्तराखंड की मुस्लिम महिलाओं ने दायर किए थे। गौर ने यह भी कहा कि हलाला प्रथा के खिलाफ एक याचिका लंबित है। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता रोमी चाको ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग UCC लागू करने से अपेक्षित परिणाम हासिल करना मुश्किल हो सकता है। उनके अनुसार, राज्यवार कानून वहां की सामाजिक परिस्थितियों और रीति-रिवाजों के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं। उन्होंने आशंका जताई कि लोग अपने निवास स्थान में बदलाव करके किसी कानून से बचने की कोशिश कर सकते हैं।

कीर्ति उप्पल ने हिंदू विवाह अधिनियम का किया उल्लेख

कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ अधिवक्ता कीर्ति उप्पल ने किया। उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 का जिक्र करते हुए कहा कि इस कानून से पहले हिंदू समुदाय में विवाहों की संख्या को लेकर ऐसी वैधानिक सीमा नहीं थी, जैसी बाद में निर्धारित की गई। उप्पल ने कहा कि एक से अधिक विवाह की प्रथा उस समय बड़ी समस्या थी और हिंदू विवाह अधिनियम के जरिए एक विवाह के रहते दूसरी शादी करने पर कानूनी रोक लगाई गई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने समान नागरिक संहिता की जरूरत, देशव्यापी कानून की व्यवहारिकता और विवाह तथा व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार रखे।

(ANI)

ये भी पढ़ें: नागपुर MLC चुनाव: कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने BJP के सुधाकर कोहाले को 3,271 वोटों से हराया