ग्वालियर स्मार्ट सिटी बस सेवा पर बड़ा संकट, 11 करोड़ का निवेश फिर भी व्यवस्था ठप
ग्वालियर। 'स्मार्ट सिटी' के नाम पर ग्वालियर को आधुनिक बनाने का सपना अब एक बड़ी विफलता की ओर बढ़ता दिख रहा है। शहरवासियों को सस्ती, सुगम और बेहतर सार्वजनिक परिवहन सुविधा मुहैया कराने के उद्देश्य से शुरू की गई 'स्मार्ट सिटी बस सेवा' आज पूरी तरह से दम तोड़ती नजर आ रही है। करोड़ों रुपये के बजट के बाद भी यह सेवा अब केवल कागजों और यार्ड में खड़ी बसों तक सिमटकर रह गई है।
11 करोड़ का निवेश और 'कबाड़' में तब्दील होती बसें
शहर के सार्वजनिक परिवहन तंत्र को नई दिशा देने के लिए सरकार और स्मार्ट सिटी कंपनी द्वारा लगभग 11 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च की गई थी। इन बसों का उद्देश्य शहर के प्रमुख मार्गों को जोड़ना और आम जनता के लिए यातायात को सरल बनाना था।
हालांकि, आज स्थिति इसके विपरीत है। जिन बसों को शहर की 'लाइफलाइन' बनना था, वे रखरखाव और सही संचालन न हो पाने के कारण सुनसान इलाकों में खड़ी होकर कबाड़ में तब्दील हो रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार, सड़कों से बसें गायब हैं, जिससे यात्रियों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
इसलिए फेल हुआ यह प्रोजेक्ट
स्थानीय स्तर पर आ रही खबरों और पिछले वर्षों के घटनाक्रम के अनुसार, इस परियोजना के विफल होने के मुख्य कारण बस संचालकों और स्मार्ट सिटी कंपनी के बीच समन्वय की कमी है। बसों का नियमित मेंटेनेंस न होना, जिसके चलते वे जल्दी खराब हो गईं। अक्सर बसें निर्धारित रूटों पर नहीं चलतीं, जिससे यात्रियों को बस का इंतज़ार करना पड़ता है। फंड के उपयोग और संचालन नीति में स्पष्टता का अभाव।
आम जनता पर असर
ग्वालियर में सार्वजनिक परिवहन की स्थिति पहले से ही चुनौतीपूर्ण रही है। जहाँ एक ओर शहर बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर सस्ती सरकारी बस सेवा के ठप होने से आम आदमी को मजबूरन निजी ऑटो और टेम्पो पर अधिक किराया खर्च करना पड़ रहा है। शहर के सरकारी कार्यालयों और दूर-दराज के इलाकों में जाने के लिए कोई भी सुगम बस सेवा उपलब्ध नहीं है, जिससे दैनिक यात्रियों का बजट और समय दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
प्रशासन की कार्यशैली पर कई सवाल
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत शुरू की गई इस योजना का इस तरह से विफल होना प्रशासन की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े करता है। करोड़ों के जनता के पैसे से खरीदी गई बसें यदि सड़कों पर उतरने के बजाय धूल फांक रही हैं तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक लापरवाही का उदाहरण है। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इस ओर ध्यान देगा या यह परियोजना हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर रह जाएगी।
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