दिल्ली हाईकोर्ट ने पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के

जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ FIR की याचिका पर सुनवाई से HC का इनकार

High Court Refuses to Hear Plea Seeking FIR Against Justice Yashwant Varma

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को पूर्व दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी की बरामदगी और बाद में उसे हटाए जाने के मामले में एफआईआर दर्ज करने और सीबीआई या विशेष जांच दल (एसआईटी) द्वारा स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

याचिकाकर्ता के अधिकार क्षेत्र पर उठाया सवाल

न्यायमूर्ति अमित बंसल ने याचिकाकर्ता, अधिवक्ता घनश्याम उपाध्याय के अधिकार क्षेत्र पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनके पास दिल्ली पुलिस और उसके बाद सक्षम मजिस्ट्रेट से संपर्क करने का वैकल्पिक उपाय है। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने टिप्पणी की, “मैं इस पर सुनवाई नहीं कर रहा हूँ, महोदय। यह एक निराधार कार्रवाई है। क्या आपके पास करने के लिए कुछ और बेहतर नहीं है?” न्यायालय ने बाद में उपाध्याय को याचिका वापस लेने और कानून के अनुसार उचित उपाय अपनाने की अनुमति दी।

आग लगने के बाद नकदी मिलने का दावा

उपाध्याय स्वयं उपस्थित हुए और उन्होंने मार्च 2025 में न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास में आग लगने के बाद कथित तौर पर नकदी की मौजूदगी, हिरासत और गायब होने के मामले में एफआईआर दर्ज करने और सीबीआई या एसआईटी द्वारा स्वतंत्र जांच की मांग की। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संज्ञेय अपराधों को उजागर करने वाले साक्ष्य उपलब्ध होने के बावजूद आपराधिक कानून को क्रियान्वित न करना मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि इस मामले में उपलब्ध साक्ष्य एफआईआर दर्ज करने और जांच शुरू करने के लिए आवश्यक "मामूली संदेह की सीमा से कहीं अधिक" है।

आंतरिक जांच के निष्कर्षों का दिया हवाला

याचिका में यह भी कहा गया कि आंतरिक समिति और वैधानिक जांच समिति के निष्कर्ष, हालांकि उन्हें स्वयं आपराधिक दोषसिद्धि का प्रमाण नहीं माना जा सकता, संज्ञेय अपराधों के उचित संदेह का निर्धारण करने के लिए प्रासंगिक सामग्री हैं, जिसके लिए आपराधिक जांच तंत्र को सक्रिय करने की आवश्यकता है। याचिकाकर्ता ने आग लगने के बाद सामग्री साक्ष्यों को जब्त न करने और संरक्षित न करने के अलावा, नकदी के कथित स्रोत, स्वामित्व, हिरासत और गायब होने की जांच की भी मांग की।

मार्च 2025 में लगी थी आग

याचिका के अनुसार, 14-15 मार्च, 2025 की दरमियानी रात को नई दिल्ली के तुगलक क्रिसेंट स्थित न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास के एक भंडारगृह/बाहरी कमरे में आग लग गई। आरोप है कि आग बुझाने और उसके बाद पुलिस की कार्रवाई के दौरान जले हुए और आंशिक रूप से जले हुए नोट देखे गए और उनकी तस्वीरें और वीडियो रिकॉर्ड किए गए।

केंद्र और CBI ने याचिका का किया विरोध

सुनवाई के दौरान, भारत सरकार और सीबीआई की ओर से पेश हुए केंद्र सरकार के स्थायी वकील प्रेमतोष कुमार मिश्रा ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को कार्यवाही जारी रखने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि उपाध्याय ने पहले सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया था। मिश्रा ने दलील दी कि याचिकाकर्ता के पास अपनी शिकायत लेकर दिल्ली पुलिस से संपर्क करने और उसके बाद सक्षम मजिस्ट्रेट के समक्ष मामला पेश करने का वैकल्पिक उपाय है।

याचिकाकर्ता ने बताया मामला असाधारण

हालांकि, उपाध्याय ने तर्क दिया कि मामला "असाधारण प्रकृति" का है और दावा किया कि मजिस्ट्रेट इस मामले से उचित रूप से निपटने के लिए सक्षम नहीं होगा, क्योंकि मजिस्ट्रेट सीबीआई या एसआईटी जांच का निर्देश नहीं दे सकता। दलीलों पर विचार करने के बाद, उच्च न्यायालय ने याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को कानून के तहत उचित उपाय अपनाने की स्वतंत्रता के साथ इसे वापस लेने की अनुमति दी।

वैधानिक जांच की पृष्ठभूमि में आया फैसला

यह घटनाक्रम न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास पर जले हुए नोटों की बरामदगी से संबंधित परिस्थितियों की वैधानिक जांच की पृष्ठभूमि में सामने आया है। न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने अज्ञात नोटों की उपस्थिति, साक्ष्यों के संरक्षण और न्यायमूर्ति वर्मा द्वारा दिए गए स्पष्टीकरणों से संबंधित आरोपों पर निष्कर्ष दर्ज किए हैं।

(एएनआई)

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