सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने

न्यायपालिका और सरकार के बीच अधिकारों की खींचतान पर बोले जस्टिस कौल, कॉलेजियम सिस्टम पर भी की चर्चा

जस्टिस संजय किशन कौल का बड़ा खुलासा

नई दिल्ली: अपनी आने वाली किताब 'विदाउट फियर ऑफ फेवर' में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा है कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) केस में फैसला सुनाने के लिए उन पर कोई दबाव नहीं था। नवंबर 2023 में जस्टिस कौल की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की स्पेशल बेंच ने PMLA एक्ट में किए गए बदलावों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई जारी न रखने का फैसला किया था। कहा जाता है कि बेंच को भंग करने का फैसला इसलिए लिया गया, क्योंकि जस्टिस कौल 25 दिसंबर को रिटायर हो रहे थे और केस में डिटेल में सुनवाई की ज़रूरत थी, जब उनसे पूछा गया कि क्या PMLA केस के दौरान उन पर कोई प्रेशर था।

रिटायरमेंट से पहले पूरी करना चाहता था सुनवाई: जस्टिस कौल

जस्टिस कौल ने ANI को दिए एक इंटरव्यू में कहा, "नहीं, मुझ पर कोई प्रेशर नहीं था, सिवाय इसके कि इसमें इतनी देर हो गई थी कि मैं इसे खत्म करने की कोशिश करना चाहता था। हम सिर्फ यह सुन रहे थे कि क्या फैसलों को बड़ी बेंच को भेजा जा सकता है या नहीं। इससे ज़्यादा कुछ नहीं था। बेल के मुद्दे और बेल की शर्तों पर कुछ बातें थीं, जिन्हें अब सुनवाई के लिए आगे बढ़ाया गया था। फिर एक बेंच ने सभी मामलों को एक साथ करने की कोशिश की। मेरा मामला वहां गया, जिस पर मैंने एतराज़ जताया। बेंच ने सुनना शुरू किया। आखिरकार, जब सरकार ने कहा कि वे इस तारीख को अवेलेबल नहीं हैं, उस तारीख को अवेलेबल नहीं हैं, तो आखिरकार हमने शुरू किया। हम इस पर सुनवाई कर रहे थे जब यह मुद्दा उठा, कि देखो सिस्टम के बाहर कुछ लोग। मैंने कहा, वे क्या कहेंगे? कि मैं सिस्टम में पैसा कमा रहा हूं? अगर मुझे इसके आगे झुकना पड़ा, तो मुझे हालात के लिए अफसोस है। हम वापस सुनवाई पर गए, लेकिन उसके बाद सरकारी पक्ष ने कहा कि नहीं, उन्हें जवाब देने के लिए और समय चाहिए। मैं आगे बढ़ना चाहता था क्योंकि यह 3 बजे थे, लेकिन जब बेंच ने वह सुविधा देने का मन बनाया, तो मुझे पता था कि मैं यह मामला खत्म नहीं कर पाऊंगा, क्योंकि मैं रिटायरमेंट के करीब था। इसलिए जब तक मैं खत्म करूंगा, तब तक कुछ तो लिखना ही होगा। आपको इस पर सोचने और इसे लिखने में सक्षम होना चाहिए।

ज्यूडिशियल नियुक्तियों की प्रक्रिया पर जस्टिस कौल ने जताई नाराजगी

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज ने ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स के बारे में भी बात की और इस प्रोसेस पर अपनी चिंताएं जताईं। उन्होंने कहा, यह ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स का केस था, जिसके बारे में मैंने बात की थी। सच कहूं तो इसने मुझे परेशान किया, जब इसे डिलीट किया गया और इसका ज़िक्र किया गया, तो मैं परेशान हो गया। चीफ जस्टिस ने इस मामले को मेरी कोर्ट से दूर ले जाना सही समझा, क्योंकि दो साल पहले किसी को यह केस मुझे मार्क करना चाहिए था और वह फॉर्मल नोटिंग नहीं थी। मुझे इसमें कोई वजह नहीं मिली। और हां, बाद में लंच के बाद मैंने कहा कि कुछ बातें अनकही रह गई हैं। मैं, अपने ऑफिस छोड़ने के इस स्टेज पर यह चीज़ नहीं बनाना चाहता। चीफ जस्टिस ने देखा और कहा कि उन पर किसी तरह का प्रेशर है। मुझे नहीं पता। मैं अपॉइंटमेंट्स के लिए ज़ोर दे रहा था। यह एक धीमा प्रोसेस है, जो था, लेकिन जिस तरह से यह किया गया वह सही नहीं था। जस्टिस कौल ने बताया कि उस समय के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ का मानना ​​था कि अपॉइंटमेंट प्रोसेस में सरकार को जानकारी देनी चाहिए। 

न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच हमेशा रहा है टकराव

जस्टिस कौल ने कहा, किसी तरह उन्हें लगा कि पहले (ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट) ऐसे ही होते थे। अब भी ऐसे ही हो रहे हैं। सरकार को लूप में रखना होगा। यही उनका बेसिस था। मैंने हां कहा, लेकिन फिर कॉलेजियम सिस्टम लाया गया, ताकि ज्यूडिशियरी एक कॉन्स्टिट्यूशनल स्कीम में कुछ ऐसा डाल सके जो वहां शब्दों में नहीं था, क्योंकि वह अपॉइंटमेंट के तरीके से खुश नहीं थी। यह 90 के दशक की शुरुआत, 80 के दशक के आखिर की बात है, जब प्रॉब्लम शुरू हुईं। आखिरकार, इसका नतीजा ज्यूडिशियल इंटरप्रिटेशन से कॉलेजियम सिस्टम के रूप में सामने आया, जिसने इसे बड़ा किया और सरकार की भूमिका को कम किया। इसने शुरू में अच्छा काम किया। एक कारण यह था कि कोएलिशन सरकारें थीं। ज्यूडिशियरी और एग्जीक्यूटिव के बीच हमेशा थोड़ी डोमेन वॉर होती रहती है। जब एग्जीक्यूटिव कमजोर होती है, तो ज्यूडिशियरी बेहतर स्थिति में होती है और थोड़ा जोर लगा पाती है। जब सरकार मजबूत होती है, तो चीजों को आगे बढ़ाना और मुश्किल हो जाता है।

(इनपुट: ANI)

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