महिलाओं ने अपने गहने गिरवी रखकर गौशाला की गायों के लिए की चारे की व्यवस्था, शासन ने नहीं दे रहा संचालन राशि
डिंडौरी: मध्य प्रदेश में डिंजौरी जिला के मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर कारोपानी पंचायत की गौशाला इन दिनों गंभीर अव्यवस्थाओं का प्रतीक बन चुकी है। जिस गौशाला का उद्देश्य बेसहारा गौवंश को संरक्षण, भोजन और उपचार उपलब्ध कराना था, वहीं आज मूक प्राणियों के लिए पीड़ा और मौत का ठिकाना बनती नजर आ रही है।
आंखें नम कर देने वाला है अंदर का दृश्य
गौशाला के अंदर का दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति की आंखें नम कर देने वाला है। कई गायें कमजोर और कुपोषित दिखाई देती हैं, मानो उन्हें पर्याप्त चारा और पानी नहीं मिल रहा हो। कुछ गौवंश के शरीर, आंखों और नाक पर गहरे घाव हैं, लेकिन उनके उपचार की कोई समुचित व्यवस्था दिखाई नहीं देती।
एक गड्ढे में पड़े थे चार मृत गौवंश
एक मासूम बछड़ा मूर्छित अवस्था में जमीन पर पड़ा मिला, जो मानो जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहा था। सबसे दर्दनाक तस्वीर गौशाला से कुछ ही दूरी पर देखने को मिली, जहां एक गड्ढे में लगभग चार मृत गौवंश पड़े थे। उनके शवों को आवारा कुत्ते नोच-नोचकर खा रहे थे। कुछ शव खुले में पड़े होने के कारण कुत्तों के झुंड उन्हें अपना निवाला बना रहे थे। यह दृश्य केवल प्रशासनिक लापरवाही ही नहीं, बल्कि गौसंरक्षण व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।
बीते एक महीने में लगभग 15 गौवंश की हो चुकी है मौत
गौशाला का संचालन कर रहे मां अंबे आजीविका स्व-सहायता समूह की महिलाओं का कहना है कि पिछले तीन महीनों से शासन की ओर से संचालन राशि उनके खाते में नहीं आई है। मजबूरी में समूह की महिलाओं ने अपने गहने तक गिरवी रखकर गायों के लिए चारा-भूसे की व्यवस्था की, ताकि मूक प्राणियों को भूखा न रहना पड़े। समूह की सचिव के अनुसार, बीते एक महीने में लगभग 15 गौवंश की मौत हो चुकी है। इस संबंध में कई बार संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत कराया गया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
स्वीकृत क्षमता से ज्यादा रखी जा रहीं गायें
गौशाला की स्वीकृत क्षमता 103 गौवंश की है, जबकि वर्तमान में यहां लगभग 130 से 150 गायें रखी गई हैं। क्षमता से कहीं अधिक गौवंश होने के कारण चारा, पानी, उपचार और रख-रखाव की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब क्षमता सीमित थी, तब अतिरिक्त गौवंश यहां क्यों भेजे गए? और अगर भेजे गए, तो उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी किसकी थी? सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर जिम्मेदार अधिकारी समय-समय पर गौशाला का निरीक्षण क्यों नहीं करते? अगर निरीक्षण होता, तो क्या इतनी बड़ी संख्या में गौवंश की मौत होती?
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