मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के निर्देश लिए वापस
जबलपुर। न्यायमूर्ति राजेश कुमार गुप्ता ने पिछले वर्ष एक ट्रायल जज के खिलाफ कठोर आदेश दिया था। बाद में न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने रजिस्ट्रार जनरल को इसके विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्देश दिया था। बुधवार को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने अपना पूर्व आदेश वापस ले लिया, जिसमें रजिस्ट्रार जनरल को उच्च न्यायालय के एकल-न्यायाधीश के आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करने के लिए कहा गया था।
जांच की अनुशंसा की थी
एकल-न्यायाधीश न्यायमूर्ति Rajesh Kumar Gupta ने 12 सितंबर 2025 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश Vivek Sharma द्वारा पारित आदेश की जांच की सिफारिश की थी। अपने आदेश में न्यायमूर्ति गुप्ता ने भूमि अधिग्रहण मामले में गबन के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ कुछ आरोप हटाने के लिए न्यायाधीश शर्मा के विरुद्ध जांच की अनुशंसा की थी। इसके बाद न्यायमूर्ति Atul Sreedharan और न्यायमूर्ति Pradeep Mittal की खंडपीठ ने इस आदेश का स्वतः संज्ञान लिया।
जस्टिस श्रीधरन का आदेश
न्यायमूर्ति श्रीधरन (जिनका बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में तबादला हो गया) की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा था कि न्यायमूर्ति गुप्ता का आदेश अनुमानों (speculation) पर आधारित है और इससे ट्रायल न्यायाधीशों पर नकारात्मक प्रभाव (chilling effect) पड़ेगा। इसी आधार पर खंडपीठ ने रजिस्ट्रार जनरल को इस आदेश के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल करने का निर्देश दिया था। हालांकि, यह अपील कभी दाखिल नहीं की गई। अब इस आदेश को वापस ले लिया गया है।
मामला उच्च न्यायालय की प्रशासनिक पीठ के समक्ष
22 अप्रैल को मुख्य न्यायाधीश Sanjeev Sachdeva और न्यायमूर्ति Vinay Saraf की खंडपीठ ने कहा कि मामला अब उच्च न्यायालय की प्रशासनिक समिति के समक्ष रखा जा चुका है और इसे आंतरिक प्रक्रिया (in-house mechanism) के तहत निपटाया जाएगा। पीठ ने कहा, "यह देखते हुए कि कार्यवाही पहले ही प्रशासनिक समिति के समक्ष विचारार्थ रखी जा चुकी है और मामला उसके सक्रिय विचाराधीन है, हम दिनांक 22.09.2025 के आदेश को इस सीमा तक वापस लेते हैं, जिसमें रजिस्ट्रार जनरल को सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्देश दिया गया था। आगे की कार्रवाई प्रशासनिक समिति की सिफारिश और तत्पश्चात सक्षम प्राधिकारी द्वारा की जाएगी।"
पीठ ने कर्यवाही समाप्त करने का आदेश दिया था
पीठ ने इस मामले में स्वतः संज्ञान (suo motu) कार्यवाही को भी समाप्त करने का आदेश दिया। न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि पूर्व खंडपीठ ने स्वयं कहा था कि न्यायिक अनुशासन (judicial discipline) के अनुसार ऐसे आदेशों में उच्च न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता और उनकी न्यायिक समीक्षा का अधिकार केवल सुप्रीम कोर्ट को है।
रजिस्ट्रास से रिपोर्ट भी मांगी गई थी
पीठ ने आगे बताया कि बाद में संबंधित मामलों के अभिलेख तथा प्रधान रजिस्ट्रार (विजिलेंस) से रिपोर्ट भी मांगी गई थी। "इसके बाद मामला प्रशासनिक समिति के समक्ष रखा गया," पीठ ने कहा। अदालत ने Supreme Court of India के 9 अप्रैल के हालिया निर्णय का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि यदि ट्रायल जज के आदेश में कोई त्रुटि पाई जाती है, तो उसे उच्च न्यायालय के आंतरिक तंत्र के तहत ही देखा जाना चाहिए।
सार्वजनिक आलोचना की बढ़ती प्रवृति के प्रति सावधान किया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में उच्च न्यायालयों को अधीनस्थ न्यायिक अधिकारियों की सार्वजनिक आलोचना की बढ़ती प्रवृत्ति के प्रति भी सावधान किया था। वर्तमान मामले में पीठ ने कहा कि प्रशासनिक स्तर पर पहले से ही यह प्रक्रिया अपनाई गई है कि किसी भी न्यायिक आदेश में की गई टिप्पणी या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा की गई सिफारिश को प्रशासनिक समिति के समक्ष रखा जाएगा। इस मामले में उच्च न्यायालय की ओर से अधिवक्ता संदीप कुमार शुक्ला उपस्थित हुए।
यह भी पढ़ें : https://www.primenewsnetwork.in/india/piyush-goyal-on-india-us-trade-deal-best-deal-compared-to-neighbouring/131831