उत्तराखंड में मदरसों की साप्ताहिक छुट्टी शुक्रवार

मदरसों पर ताले, बच्चों के भविष्य पर सवाल; शुक्रवार की छुट्टी पर घमासान के बीच शिक्षा का हिसाब कौन देगा?

Madrasas Shut, Children Future at Risk Amid Friday Holiday Row

देहरादून: उत्तराखंड में मदरसों की साप्ताहिक छुट्टी शुक्रवार के बजाय रविवार करने की कवायद के बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अब सवाल सिर्फ छुट्टी बदलने का नहीं, बल्कि मदरसों में पढ़ने वाले हजारों बच्चों की शिक्षा और उनके भविष्य का है। दावा किया जा रहा है कि प्रदेश में पंजीकृत 452 मदरसों में से महज 35 को मान्यता मिली है, 227 मदरसे स्वतः बंद हो चुके हैं, जबकि 19 मदरसों को सील किया गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि इन मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे आखिर कहां गए? कितने बच्चों का दूसरे स्कूलों में दाखिला हुआ और कितने शिक्षा की मुख्यधारा से बाहर हो गए? इन सवालों के बीच दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों के शिक्षण संस्थानों की मान्यता को लेकर भी दोहरे मानदंड अपनाने के आरोप लगाए जा रहे हैं।

मदरसों पर कार्रवाई, बच्चों की पढ़ाई पर सवाल

मदरसों पर ताले... मान्यता पर सवाल... और बच्चों के भविष्य पर बवाल! उत्तराखंड में मदरसा शिक्षा को लेकर सरकार की नीति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। दावा है कि प्रदेश में पंजीकृत 452 मदरसों में से सिर्फ 35 को मान्यता मिली है। वहीं, 227 मदरसे स्वतः बंद हो चुके हैं, जबकि 19 मदरसों पर सीलिंग की कार्रवाई की गई है। बाकी मदरसों के मान्यता संबंधी आवेदन लंबित बताए जा रहे हैं। लेकिन इस पूरी कवायद में सबसे बड़ा सवाल उन बच्चों की पढ़ाई को लेकर है, जिनकी शिक्षा बीच सत्र में प्रभावित होने की बात कही जा रही है। आखिर ये बच्चे कहां हैं? किस स्कूल में पढ़ रहे हैं? कितने बच्चों को दूसरे शिक्षण संस्थानों में दाखिला मिला और कितने अब भी शिक्षा से दूर हैं? इन सवालों के जवाब मिलना जरूरी है।

शुक्रवार या रविवार, बहस के बीच पढ़ाई का सवाल

दिलचस्प बात यह है कि सरकार मदरसों की साप्ताहिक छुट्टी शुक्रवार से बदलकर रविवार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। लेकिन इस प्रस्ताव का विरोध करने वालों का सवाल है कि जब बड़ी संख्या में मदरसे बंद हो चुके हैं, तो छुट्टी बदलने से पहले बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करना ज्यादा जरूरी नहीं है? आखिर सरकार यह स्पष्ट क्यों नहीं करती कि बंद हुए मदरसों में पढ़ने वाले कितने बच्चों को दूसरे शिक्षण संस्थानों में प्रवेश मिला है? सवाल छुट्टी का नहीं... सवाल पढ़ाई का है। सवाल कैलेंडर का नहीं... बच्चों के भविष्य का है।

दूसरे अल्पसंख्यक शिक्षण केंद्रों की मान्यता पर भी सवाल

मामला सिर्फ मदरसों तक सीमित नहीं है। आरोप है कि प्रदेश में सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन समुदायों से जुड़े 51 अल्पसंख्यक शिक्षण केंद्रों में से भी महज दो को मान्यता मिली है। ऐसे में सवाल उठाया जा रहा है कि क्या सभी अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के लिए मान्यता देने और कार्रवाई करने के मानक समान हैं? मदरसा शिक्षा से जुड़े प्रतिनिधियों ने सरकार पर दोहरी नीति अपनाने का आरोप लगाया है। हालांकि, इन आरोपों की स्थिति स्पष्ट करने के लिए सरकार और संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना जरूरी है। साथ ही, मान्यता संबंधी नियमों और उन पर अमल की स्थिति को लेकर भी स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए।

बंद मदरसों की इमारतों और संसाधनों का क्या होगा?

एक बड़ा सवाल उन 227 मदरसों को लेकर भी है, जो कथित तौर पर स्वतः बंद हो गए हैं। बताया जा रहा है कि इनमें से कई मदरसे जनता से मिले चंदे से स्थापित किए गए थे। अब सवाल है कि इन संस्थानों की इमारतों, संसाधनों और दूसरी परिसंपत्तियों का भविष्य क्या होगा? क्या इनका दोबारा शैक्षणिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा? क्या यहां सामाजिक कल्याण से जुड़े काम शुरू होंगे? या फिर ये भवन यूं ही बंद पड़े रहेंगे? सरकार के सामने चुनौती सिर्फ मदरसों की मान्यता से जुड़ी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। बंद या प्रभावित संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करना, उनके दाखिले की स्थिति स्पष्ट करना और बंद भवनों व संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर पारदर्शी नीति बनाना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि आखिरकार, इस पूरे विवाद के केंद्र में छुट्टी का दिन नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई और उनका भविष्य है।

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