Kolkata : नाबालिग बच्चे भी अब वयस्कों की तरह किसी

नाबालिग भी अग्रिम जमानत के हकदार, कोलकाता हाईकोर्ट का फैसला

नाबालिग भी अग्रिम जमानत के हकदार, कोलकाता हाईकोर्ट का फैसला

Kolkata : नाबालिग बच्चे भी अब वयस्कों की तरह किसी अपराध में नामित होने पर अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकेंगे। कोलकाता हाईकोर्ट की तीन जजों की पीठ ने यह ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए साफ कर दिया कि नानालिगों को भी पकड़े जाने से पूर्व कानूनी सुरक्षा पाने का पूरा हक है।

तीन जजों की डिवीजन बेंच ने कहा कि "जुवेनाइल जस्टिस एक्ट" तब लागू होता है जब नाबालिग पकड़ा जाता है और उसे जुवेनाइल बोर्ड के सामने पेश किया जाता है। लेकिन अग्रिम जमानत तो गिरफ्तारी से पहले का अधिकार है, ताकि किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सुरक्षित रहे।

अब तक नाबालिगों के मामले में राहत देने या न देने का फैसला पूरी तरह "जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड" के विवेक पर निर्भर होता था, लेकिन बोर्ड में अग्रिम जमानत का कोई प्रावधान नहीं था। यानी नाबालिग चाहे किसी भी हालात में हों, पकड़े जाने से पहले सुरक्षा कवच नहीं ले सकते थे।

यह फैसला कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस जाँय सेनगुप्ता, जस्टिस तीर्थंकर घोष और जस्टिस बिभास पटनायक की बेंच ने दिया है। देश के किसी भी हाईकोर्ट की तरफ से सुनाया गया इस तरह का यह पहला फैसला है। पीठ में शामिल तीन में से 2 जजों ने इस फैसले का समर्थन किया है। जस्टिस सेनगुप्ता और जस्टिस घोष का कहना है कि नाबालिगों को अग्रिम जमानत देना सही है, लेकिन जस्टिस पटनायक ने इसका विरोध किया है। ऐसे में यह फैसला 2-1 से पास हुआ। अब कोई भी नाबालिग अपराधी अग्रिम जमानत के लिए अप्लाई कर सकता है।

अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं

जस्टिस जाँय सेनगुप्ता, जस्टिस तीर्थंकर घोष और जस्टिस विभास पटनायक की पीठ ने कहा, वयस्क जब किसी भी आरोप के बाद अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं, तो नाबालिग क्यों नहीं। याचिका में यह भी दलील दी गई थी कि एक बच्चे का मूल अधिकार है कि वह अपने माता-पिता और परिवार के साथ रहे।

दरअसल 2021 में पश्चिम बंगाल के रघुनाथगंज पुलिस स्टेशन में दर्ज एक मामले में आरोपित बनाये गये चार नाबालिगों द्वारा कोर्ट में याचिका दायर कर संभावित गिरफ्तारी से बचने के लिए एंटीसिपेटरीबेल की मांग की गयी थी। तब इस मुद्दे पर गर्मागर्म बहस हुई कि क्या जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, 2015 उन्हें अग्रिम जमानत (धारा 438) का अधिकार देता है या नहीं। इस बात पर जजों की अलग-अलग राय थी इसलिए एक सिंगल जज ने इसे बड़ी पीठ के पास भेज दिया था, ताकि फैसला हो सके।

एंटीसिपेटरी बेल CrPC की धारा 438 के तहत मिलती है। इसका मतलब है गिरफ्तारी से पहले मिलने वाली जमानत। अगर किसी व्यक्ति को लगता है कि पुलिस उसे किसी मामले में गिरफ्तार कर सकती है, तो वह पहले से ही कोर्ट (सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट) में जाकर जमानत मांग सकता है। कोर्ट अगर जमानत दे दे, तो पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर सकती या गिरफ्तार करे भी तो तुरंत जमानत पर छोड़ना पड़ेगा।

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