दिल्ली उच्च न्यायालय ने नेहा बोरा की पुलिस के खिल

दिल्ली उच्च न्यायालय में पुलिस द्वारा शुरू की गई कार्रवाई के खिलाफ नेहा बोरा की याचिका खारिज

All India Students' Association (AISA) National President Neha Bora

नई दिल्ली। दिल्ली उच्च न्यायालय ने ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा के खिलाफ शुरू की गई एहतियाती कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने माना है कि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) द्वारा उन्हें जारी किया गया कारण बताओ नोटिस कानून की आवश्यकताओं को पूरा करता है और इस स्तर पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सुरक्षा उपायों का उल्लंघन नहीं हुआ है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत कार्यवाही शुरू

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने पाया कि यह नोटिस एसईएम द्वारा पुलिस रिपोर्ट, संबंधित सामग्री और संबंधित पुलिस अधिकारी के बयान पर विचार करने के बाद जारी किया गया था, तथा यह राय बनाई गई थी कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार हैं। अदालत ने कहा कि 'मधु लिमये बनाम उप-मंडलीय मजिस्ट्रेट, मुंगेर' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों का इस चरण में उल्लंघन नहीं हुआ है। अदालत ने बोरा की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें उस नोटिस को चुनौती दी गई थी जिसमें उन्हें यह दिखाने के लिए कहा गया था कि शांति बनाए रखने के लिए उन्हें एक लाख रुपये (नोटिस के अनुसार 10,000 रुपये) के मुचलके और वैसी ही राशि की एक जमानत क्यों नहीं देनी चाहिए।

नोटिस के स्तर पर एहतियाती कार्रवाई शुरू

यह फैसला नोटिस के स्तर पर एहतियाती कार्रवाई शुरू करने को न्यायिक समर्थन प्रदान करता है, जबकि विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट पर यह स्वतंत्र रूप से तय करने की जिम्मेदारी छोड़ता है कि अंततः बॉन्ड की आवश्यकता है या नहीं। अदालत ने कहा, "आक्षेपित नोटिस BNSS के अध्याय IX के तहत कारण बताओ नोटिस की आवश्यकताओं को पूरा करता है," और जोड़ा कि एसईएम को बाद की कार्यवाही के दौरान लागू कानूनी सुरक्षा उपायों का पालन सुनिश्चित करना होगा।

एहतियाती कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद

फैसले में दर्ज है कि एसईएम का 17 अक्टूबर, 2026 का आदेश पुलिस द्वारा प्रस्तुत कलंदरा और सहायक सामग्री पर आधारित था। एसईएम ने यह निष्कर्ष निकालने से पहले उप-निरीक्षक वैशाली तुषार के बयान को भी दर्ज किया कि एहतियाती कार्रवाई शुरू करने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, बोरा ने कथित तौर पर निषेधाज्ञा के बावजूद विरोध प्रदर्शन से जुड़ी गतिविधियों में हिस्सा लिया था और 16 अक्टूबर को लोगों को मंडी हाउस पर इकट्ठा होने के लिए कहा था।

कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में अनधिकृत प्रदर्शन

पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि वह कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में अनधिकृत प्रदर्शन के लिए लोगों को जुटाने के प्रयासों में शामिल थीं, और इससे सार्वजनिक शांति एवं कानून व्यवस्था भंग होने की आशंका थी। पुलिस की सामग्री में पिछले विरोध प्रदर्शनों और आगे भी प्रदर्शनों की संभावना का भी जिक्र किया गया था। ये आरोप उन सामग्रियों का हिस्सा थे जिन पर एसईएम ने कार्यवाही शुरू करते समय विचार किया था। बोरा को दिल्ली पुलिस ने 16 अक्टूबर को हिरासत में लिया था, जब उन्होंने इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर शाम 5 बजे मंडी हाउस पर लोगों को इकट्ठा होने के लिए आमंत्रित किया था। अगले दिन उन्हें रिहा कर दिया गया, जब एसईएम ने BNSS की धारा 126 और 130 के तहत नोटिस जारी किया।

बोरा ने नोटिस को रद्द करने की मांग की थी

बोरा ने नोटिस को रद्द करने की मांग करते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था, जिसमें तर्क दिया गया था कि यह BNSS की धारा 126 की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है और अपर्याप्त सामग्री पर आधारित है। बोरा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि नोटिस एहतियाती कार्यवाही को नियंत्रित करने वाले कानूनी नियमों का पालन नहीं करता है। उन्होंने ऐसे मामलों में सुरक्षा उपाय तय करने वाले सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय के फैसलों का भी हवाला दिया।

उच्च न्यायालय ने याचिका को किया खारिज

याचिका को खारिज करते हुए, उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एसईएम को इस बात का स्वतंत्र आकलन करना होगा कि क्या बोरा को व्यक्तिगत मुचलका या जमानत बांड प्रस्तुत करने की आवश्यकता है या नहीं। अदालत ने विशेष रूप से BNSS की धारा 135(3) का हवाला दिया और इसे एसईएम पर छोड़ दिया कि वह जांच के शुरुआती चरण में बांड पर जोर देने का निर्णय ले सकता है। अदालत ने कहा कि यह प्रावधान जांच शुरू होने के बाद और पूरी होने से पहले शांति भंग होने या खलल पड़ने की आशंका उत्पन्न होने पर बांड प्रस्तुत करने की परिकल्पना करता है।

कानून के तहत उपलब्ध उपायों का पालन करने के लिए बोरा स्वतंत्र

इस प्रावधान के तहत आदेश पारित करते समय एसईएम को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 'मधु लिमये' मामले में और दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 'अलदानिश रैन बनाम एनसीटी दिल्ली' मामले में निर्धारित सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखना चाहिए। उच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां कारण बताओ नोटिस जारी करने के चरण में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हस्तक्षेप के प्रश्न तक ही सीमित हैं। जांच में अंतिम आदेश के बाद सहित कानून के तहत उपलब्ध उपायों का पालन करने के लिए बोरा स्वतंत्र रहेंगी।

(इनपुटः ANI)

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