नर्मदा में हजारों लीटर दूध बहाने पर एनजीटी ने मांगा जवाब
सीहोर। नर्मदा नदी की शुद्धता और पर्यावरण संरक्षण को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की सेंट्रल जोन बेंच ने कड़ा रुख अपनाया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एमपीपीसीबी) को नोटिस जारी कर वैज्ञानिक डेटा के साथ रिपोर्ट तलब की है। मामला सीहोर जिले के ग्राम पंचायत सातदेव और भैंरुदा में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम से जुड़ा है। यहाँ धार्मिक आयोजन के समापन पर नर्मदा नदी में करीब 11 हजार लीटर दूध, 250 साड़ियां, काजू-बादाम और अन्य सामग्री बहाई गई थीं।
जल प्रदूषण कानून 1974 के तहत नदी में जैविक पदार्थ डालना प्रतिबंधित
इस मामले में जस्टिस श्यो कुमार सिंह और एक्सपर्ट मेंबर सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने सुनवाई करते हुए कहा कि वर्तमान में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास ऐसा कोई विशेष दिशा-निर्देश नहीं है जो विशेष रूप से नदी में 'दूध बहाने' (धार्मिक पूजा) को प्रतिबंधित करता हो। परंतु, 'वॉटर एक्ट 1974' (जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम) के तहत नदियों में किसी भी ऐसी जैविक या अन्य सामग्री को डालने पर पूरी तरह प्रतिबंध है, जिससे पानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) बढ़ती है।
याचिकाकर्ता की दलील, दूध बहाने से नदी दूषित होगी, जलीय जीव मरेंगे
यह याचिका सिद्धार्थ सिंह राजपूत और अन्य द्वारा दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि पवित्र नर्मदा नदी में इतनी भारी मात्रा में दूध और कपड़े (साड़ियां) बहाना पर्यावरण और इसकी पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) के खिलाफ है। इससे मछलियां और अन्य जलीय जीव मरेंगे। नदी का पानी दूषित हो जाएगा, जो आसपास के गांवों के लिए पीने और सिंचाई के योग्य भी नहीं बचेगा। इस मामले की अगली सुनवाई 17 जुलाई को होगी, जिसमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय निदेशक (भोपाल) व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव को विशेषज्ञों से वैज्ञानिक डेटा जुटाने को कहा गया है।
एनजीटी ने मांगा सफाई
एनजीटी ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों से वैज्ञानिक जांच कर नर्मदा में दूध प्रवाहित करने की घटना की पूरी तथ्यात्मक रिपोर्ट मांगी है। आयोजन की अनुमति किस आधार पर दी गई और क्या पर्यावरणीय नियमों का पालन हुआ या नहीं? इस गतिविधि से नदी के जल और जलीय जीवन पर संभावित रूप से क्या प्रभाव पड़ा? इस तरह के धार्मिक आयोजनों में होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए वर्तमान में क्या नियम हैं और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासन ने क्या कदम उठाए हैं? क्या नदियों में ऐसे विसर्जन को नियंत्रित करने के लिए नए दिशा-निर्देश (गाइडलाइंस) बनाने की आवश्यकता है?
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