दिल्ली HC में दायर हुई PIL में फिल्म 'सूर्या' की प्री-रिलीज़ जांच और 20 नवंबर को रिलीज़ पर अंतरिम रोक की मांग
नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट में एक पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन फाइल की गई है, जिसमें आने वाली फिल्म “सूर्या – अंत से आरंभ तक” की प्री-रिलीज़ स्क्रूटनी की मांग की गई है। इसमें मेडिकल प्रोफेशन में करप्शन और हेल्थकेयर वर्कर्स के खिलाफ हिंसा को दिखाने का आरोप है। यह पिटीशन 27 अक्टूबर को ऑल इंडिया डॉक्टर्स के लीगल सेल के वाइस प्रेसिडेंट डॉ. नचिकेता भाटिया और IMA जूनियर डॉक्टर्स नेटवर्क के नेशनल स्पोक्सपर्सन डॉ. ध्रुव चौहान ने फाइल की है।
यह पिटीशन संविधान के आर्टिकल 226 के तहत फाइल की गई
इसमें 20 नवंबर को होने वाली फिल्म की थिएटर में रिलीज पर अंतरिम रोक लगाने की भी मांग की गई है। डॉ. नचिकेता भाटिया और अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य टाइटल वाली यह पिटीशन संविधान के आर्टिकल 226 के तहत फाइल की गई है। मिनिस्ट्री ऑफ इन्फॉर्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग के जरिए यूनियन ऑफ इंडिया, सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) और फिल्म के प्रोड्यूसर, MM Moviez को रेस्पोंडेंट बनाया गया है। पिटीशनर्स के मुताबिक, फिल्म के ऑफिशियल टीज़र और ट्रेलर में कथित तौर पर मेडिकल प्रोफेशन में करप्शन को आम तौर पर दिखाया गया है।
कई डायलॉग्स पर जताई आपत्ति
उन्होंने डायलॉग्स पर आपत्ति जताई है, जिसमें मरीज़ों से 5 लाख रुपये लिए जाने और 25 टेस्ट करवाने का ज़िक्र है, साथ ही एक लाइन है, “वहाँ के डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन नहीं लिखते, वे पर्चियों पर कमीशन लिखते हैं।” पिटीशनर्स ने प्रमोशनल स्टेटमेंट्स, “अविश्वसनीय सच्ची घटनाओं से प्रेरित” और “हमारे मेडिकल सिस्टम का चौंकाने वाला सच जानें” पर भी चिंता जताई है, उनका कहना है कि ये फिल्म में हेल्थकेयर सिस्टम को दिखाए जाने को असलियत का दिखावा दे सकते हैं। पिटीशन में उठाई गई एक मुख्य चिंता डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और हॉस्पिटल के कर्मचारियों के खिलाफ शारीरिक हिंसा को हीरोइक या सही के तौर पर दिखाना है।
22 अक्टूबर को इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने दी पिटीशन
पिटीशनर्स ने दावा किया है कि इस तरह के चित्रण से हेल्थकेयर वर्कर्स खतरे में पड़ सकते हैं और इमरजेंसी सर्विसेज़ और मरीज़ों की देखभाल पर असर पड़ सकता है। यह पिटीशन 22 अक्टूबर को इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) द्वारा केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री को दिए गए एक रिप्रेजेंटेशन पर आधारित है। यह सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 की धारा 5 बी और फिल्म प्रमाणन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी हवाला देता है, जिसमें केए अब्बास, एस रंगराजन, बॉबी आर्ट इंटरनेशनल और प्रकाश झा प्रोडक्शंस शामिल हैं।
विवादित सामग्री की जांच करने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि वे स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की वैध आलोचना का विरोध नहीं करते हैं या चिकित्सकों को जवाबदेही से बचाने की कोशिश नहीं करते हैं। उनका घोषित उद्देश्य फिल्म की सार्वजनिक रिलीज से पहले कानून के अनुसार सक्षम अधिकारियों द्वारा पहचाने गए दृश्यों और संवादों की जांच करवाना है। अन्य राहतों के अलावा, याचिका में अधिकारियों को विवादित सामग्री की जांच करने और लागू कानून का उल्लंघन पाए जाने पर विशिष्ट दृश्यों और संवादों के संशोधन या विलोपन सहित उचित सुधारात्मक उपायों पर विचार करने का निर्देश देने की मांग की गई है।
विवादित सीन और डायलॉग की जल्दी से जांच करने के निर्देश की मांग
इसमें फिल्म के सर्टिफिकेशन स्टेटस और IMA के रिप्रेजेंटेशन पर की गई कार्रवाई की डिटेल्स भी मांगी गई हैं। अपनी अंतरिम एप्लीकेशन में, पिटीशनर्स ने पहचाने गए कंटेंट की शुरुआती जांच होने तक, कुछ समय के लिए फिल्म की रिलीज, एग्जीबिशन और पब्लिक स्क्रीनिंग पर अंतरिम एकतरफा रोक लगाने की मांग की है। उन्होंने मिनिस्ट्री और CBFC को सर्टिफिकेशन स्टेटस और IMA के रिप्रेजेंटेशन पर की गई कार्रवाई को रिकॉर्ड में लाने और विवादित सीन और डायलॉग की जल्दी से जांच करने के निर्देश भी मांगे हैं।
(इनपुटः ANI)
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