प्रशांत भूषण ने चुनाव आयोग के हलफनामे को बताया 'झूठा', SIR के फैसले पर उठाए सवाल; अधिकारियों पर मुकदमे की मांग
नई दिल्ली [भारत]: वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष चुनाव आयोग (ECI) के हलफनामे को "झूठा" करार दिया और इसमें शामिल अधिकारियों के खिलाफ अभियोग चलाने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि राष्ट्रव्यापी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मतदाता सूची में बदलाव से जुड़े दूरगामी फैसले औपचारिक आयोग की बैठकों, कानूनी समर्थन या प्रलेखित रिकॉर्ड के बिना किए गए थे।
RTI के जवाब में SIR के फैसले का रिकॉर्ड नहीं मिलने का दावा
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, भूषण ने कहा कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले जवाबों से पता चलता है कि चुनाव निकाय के पास इस बात का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है कि राष्ट्रव्यापी मतदाता सूची पुनरीक्षण को किसने अधिकृत किया था। भूषण ने कहा, "SIR पर निर्णय किसने लिया, कब लिया गया और कैसे लिया गया? इसके संबंध में अंजलि ने एक RTI आवेदन दायर कर उन दस्तावेजों की मांग की थी जो यह बताएं कि निर्णय किसने लिया, कब लिया और कैसे लिया। चुनाव आयोग ने जवाब दिया कि उनके पास इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं है कि SIR पर निर्णय किसने लिया, कब लिया या कैसे लिया।"
चुनाव आयोग के हलफनामे और ईमेल से मिली सहमति पर उठाए सवाल
शीर्ष अदालत के समक्ष आयोग के प्रस्तुतिकरण की आलोचना करते हुए, भूषण ने बताया कि हलफनामा एक उप चुनाव आयुक्त (Deputy Election Commissioner) द्वारा दायर किया गया था, जिसमें पूर्ण आयोग द्वारा औपचारिक विचार-विमर्श के बजाय प्रतिनिधि अधिकार (delegated authority) और ईमेल-आधारित सहमति का दावा किया गया था। उन्होंने पूछा, "सवाल यह है कि आप पूरे देश में SIR करवा रहे हैं, जो 1951 के बाद पहली बार किया जा रहा है। पिछले 75 वर्षों में देश भर में चुनावी सूची को नए सिरे से तैयार करने जैसा अभूतपूर्व निर्णय नहीं लिया गया है। और इसके संबंध में, आप दावा कर रहे हैं कि कोई बैठक नहीं हुई? कि हमने इसे इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रसारित किया, और सहमति इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्राप्त हुई थी? राष्ट्रव्यापी SIR के लिए औपचारिक बैठकों को दरकिनार करने की क्या आपात स्थिति थी?"
फॉर्म 6 में वंशावली से जुड़ी जानकारी जोड़ने पर जताई आपत्ति
भूषण ने आगे आयोग पर आंतरिक असहमति को दरकिनार करते हुए, बिना किसी कानूनी क्षमता के वंश (lineage) सत्यापन को शामिल करने के लिए फॉर्म 6 को एकतरफा रूप से बदलने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, "कानूनी रूप से फॉर्म 6 के लिए केवल तीन चीजों की आवश्यकता होती है: आयु का प्रमाण, पते का प्रमाण, और नागरिकता की स्व-घोषणा। उन्होंने एक चौथा नियम जोड़ दिया—आवेदकों से यह दिखाने के लिए कहना कि उनके माता-पिता या दादा-दादी 2002 में कहाँ थे और उनकी वंशावली का पता लगाना। एक वैधानिक फॉर्म होने के नाते, चुनाव आयोग ऐसे बदलाव नहीं कर सकता है, और अन्य दो आयुक्तों ने इस बात पर सही आपत्ति जताई थी कि इसे कैसे जोड़ा गया।"
दिल्ली में IT सेल के जरिए मतदाता सूची में बदलाव पर सवाल
उन्होंने दिल्ली में एक IT सेल में मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने के कार्यों के केंद्रीकरण को लेकर भी चिंता जताई, जिससे जमीनी स्तर के निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (ERO) को उनकी वैधानिक शक्तियों से वंचित कर दिया गया। भूषण ने जोर देकर कहा, "कोई भी महत्वपूर्ण मुद्दा, अन्य चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाए गए आपत्तियों को ऐसे दस्तावेजों द्वारा समर्थित नहीं किया गया है जो यह दिखाते हों कि अन्य चुनाव आयुक्तों ने कब और किस समय अपनी सहमति दी थी। मेरी दृष्टि में, यह हलफनामा झूठा है, और जिस अधिकारी ने इसे दायर किया, साथ ही जिसने भी उसे यह अधिकार प्रदान किया, उन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए।"
दिल्ली में 47 लाख मतदाताओं के नाम हटाने का मामला उठाया
दिल्ली में मतदाता विलोपन (deletions) से संबंधित हालिया सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही पर प्रकाश डालते हुए, भूषण ने कहा कि 47 लाख नाम हटा दिए गए, जिनमें से लगभग 32 लाख को 'स्थानांतरित' (shifted) के रूप में वर्गीकृत किया गया और उन्हें पहली बार के मतदाता फॉर्म भरने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने सवाल किया, "चुनाव आयोग ने अपने FAQs में कहा था कि जो लोग स्थानांतरित हो गए हैं, उनके नाम ड्राफ्ट रोल से हटा दिए जाएंगे और उन्हें फॉर्म 6 जमा करना होगा, जो नए मतदाताओं के लिए है और इसके लिए एक घोषणा की आवश्यकता होती है कि व्यक्ति ने पहले कभी वोट नहीं दिया है। वास्तव में, चुनाव आयोग 31 लाख लोगों से फॉर्म 6 भरने और झूठी घोषणा प्रस्तुत करने के लिए कह रहा है। इन लोगों को फॉर्म 8 दाखिल करने की अनुमति क्यों नहीं दी गई, जो विशेष रूप से स्थानांतरित मतदाताओं के लिए डिज़ाइन किया गया है?"
एल्गोरिदम के जरिए मतदाताओं को बाहर करने की आशंका जताई
मतदाता रिकॉर्ड की पहचान करने के लिए स्वचालित सॉफ्टवेयर के उपयोग पर बात करते हुए, भूषण ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया कि तार्किक विसंगतियों का मुद्दा अभी तक अदालत द्वारा तय नहीं किया गया है। हालांकि, पीठ ने यह देखा कि मतदाताओं को यांत्रिक रूप से बाहर करने के लिए एक एल्गोरिदम विकसित किया गया प्रतीत होता है, जिससे यह चिंता पैदा होती है कि एल्गोरिदम को इस तरह से डिज़ाइन किया गया था जो नागरिकों के एक विशेष वर्ग को लक्षित करता है और बाहर करता है।"
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