भोपाल साहित्य महोत्सव में विरोध की आशंका, बाबर पर सत्र रद्द
भोपाल। साहित्य एवं कला महोत्सव में पुस्तक "Babur – The Quest for Hindustan" पर होने वाला तयशुदा सत्र आख़िरी समय में रद्द कर दिया गया। इसके बाद मध्यप्रदेश की डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार पर "किताब को पढ़े बिना ही उसके कवर से निर्णय" लेने के आरोप लगे।
लेखक को भारत भवन में बोलना था
पुस्तक के लेखक आबास मालदाहियर को 10 जनवरी को भारत भवन में बोलना था। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र लिखकर कहा कि मीडिया के एक हिस्से ने "झूठी और मानहानिकारक" रिपोर्टें छापीं। उसमें दावा किया गया कि वे मुगल सम्राट बाबर का महिमामंडन करेंगे। लेखक ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि उनकी किताब बाबर को एक आक्रांता के रूप में प्रस्तुत करती है और भारतीय इतिहास में उसकी भूमिका की आलोचनात्मक समीक्षा करती है।
पुस्तक पढ़े बिना ही निंदा
अपने पत्र में उन्होंने राज्य के संस्कृति मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी पर आरोप लगाया कि उन्होंने पुस्तक पढ़े बिना ही सत्र की सार्वजनिक रूप से निंदा की। उन्होंने यह भी कहा कि मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक विकास दवे ने भी बिना पुस्तक से परिचित हुए चर्चा और किताब पर टिप्पणी की, जिससे वे निराश हुए।
कार्यक्रम में व्यवधान की आशंका
महोत्सव स्थल पर सत्र से जुड़े पोस्टरों पर विषय को सफेद कागज़ चिपकाकर ढक दिया गया। आयोजकों ने बताया कि स्थानीय प्रशासन के अनुरोध के बाद, संभावित विरोध और कार्यक्रम में व्यवधान की आशंका के चलते सत्र रद्द करने का निर्णय लिया गया।
किताब बाबर का महिमामंडल नहीं करती
भोपाल साहित्य महोत्सव के सह-संस्थापक अभिलाष खांडेकर ने कहा कि निर्णय मजबूरी में लिया गया और यह किताब बाबर का महिमामंडन नहीं करती, बल्कि उसके प्रति आलोचनात्मक है। उन्होंने कहा कि पुस्तक अंग्रेज़ी में है और विरोध करने वालों में से अधिकांश ने इसे पढ़ा भी नहीं है। आयोजकों के अनुसार, बाकी महोत्सव को प्रभावित होने से बचाने के लिए एक सत्र रद्द करना पड़ा।
ईमानदार जीवनी में होते हैं अच्छे-बुरे दोनों पक्ष
लेखक ने बताया कि किसी भी ईमानदार जीवनी में विषय के अच्छे-बुरे दोनों पक्ष आते हैं। उन्होंने बाबर को भारत में अपना प्रभाव बढ़ाने वाला आक्रांता बताया और कहा कि बाबरनामा के आधार पर लिखी गई उनकी पुस्तक भारतीय संदर्भ में बाबर को "खलनायक" की तरह प्रस्तुत करती है।
..और इसका भी दुख
लेखक ने कहा कि उन्हें सिर्फ सत्र रद्द होने का दुख नहीं, बल्कि इस बात का अधिक दर्द है कि जो लोग बाबर का विरोध करने की बात करते हैं, वे उन विद्वानों को नहीं पहचानते जो उसी बहस के लिए उन्हें बौद्धिक आधार और तर्क उपलब्ध करा रहे हैं।