विद्वानों ने आधुनिक संकटों से निपटने के लिए प्राचीन ज्ञान के उपयोग पर दिया जोर
वाराणसी (उत्तर प्रदेश)। सोमवार को प्राचीन आध्यात्मिक नगरी वाराणसी में आधुनिक चुनौतियों के लिए प्राचीन ज्ञान विषय पर एक वैश्विक संगोष्ठी (सिम्पोजियम) का आयोजन किया गया। इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में दुनिया भर के दार्शनिक, शिक्षाविद और विद्वान शामिल हुए, जिन्होंने पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के माध्यम से आज के वैश्विक संकटों का समाधान खोजने पर मंथन किया। इस कार्यक्रम के दौरान विभिन्न सभ्यताओं के बीच संवाद, वैश्विक सहयोग, विवादों के समाधान, जलवायु परिवर्तन और नैतिकता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक विचार-विमर्श किया गया, जिसमें हिंदू धर्म, इस्लाम, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म और अफ्रीकी दर्शन जैसी प्रमुख परंपराओं के विचार शामिल रहे।
विभिन्न संस्कृतियों और दर्शन के विद्वानों के विचार
संगोष्ठी में दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया विश्वविद्यालय के शोध प्रोफेसर थैडियस मेट्ज़ ने जोर दिया कि वैश्विक स्तर पर एक ऐसी सहमति बननी चाहिए जो आपसी सिद्धांतों पर आधारित हो, न कि दबाव या जबरदस्ती पर। वहीं, चियारा रोबियानो ने सभ्यताओं के बीच संवाद में धैर्य और सक्रिय रूप से सुनने के महत्व को रेखांकित किया। जोहान्सबर्ग विश्वविद्यालय की ज़हरा मैकडोनाल्ड ने इस्लामी परंपराओं और शूरा (परामर्श) का हवाला देते हुए कहा कि करुणापूर्ण संवाद के माध्यम से कमजोर और वंचित वर्गों का उत्थान करना एक नैतिक अनिवार्यता है, क्योंकि शांतिपूर्ण माहौल में ही जीवन बेहतर ढंग से जिया जा सकता है।
आचरण और व्यवहार में उतरने पर ही सार्थक है धर्म
प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान और चिन्मय इंटरनेशनल फाउंडेशन की शैक्षिक निदेशक गौरी महुलिकर ने ज्ञान के केंद्र के रूप में वाराणसी के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि दर्शन को हमारे दैनिक आचरण में व्यावहारिक नैतिकता के रूप में दिखना चाहिए। सत्यम, शिवम, सुंदरम के सनातन सिद्धांत का जिक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी धर्म या परंपरा का सैद्धांतिक ज्ञान तभी सार्थक होता है जब वह हमारे कार्यों में झलकता है। उन्होंने जोर दिया कि जब तक धार्मिक सिद्धांत आचार और व्यवहार का रूप नहीं लेते, तब तक धर्म का कोई विशेष अर्थ नहीं रह जाता।
तकनीकी और भौतिक उपायों के साथ नैतिक मूल्यों की जरूरत
यह विश्व संगोष्ठी इस बढ़ती वैश्विक समझ को संबोधित करती है कि आज के भू-राजनीतिक, पर्यावरणीय और सामाजिक संकटों का समाधान केवल तकनीकी या भौतिक उपायों से नहीं निकाला जा सकता। दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक वाराणसी में आयोजित इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य ऐतिहासिक ज्ञान प्रणालियों को समकालीन नीति-निर्माण से जोड़ना था। इसमें विभिन्न संस्कृतियों के बीच आपसी समझ, नैतिक शासन और सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों के व्यावहारिक अनुप्रयोग पर विशेष बल दिया गया।
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