पटना उच्च न्यायालय ने संजय कुमार झा द्वारा दायर उस

पटना उच्च न्यायालय का स्पष्ट फैसला, बिना सबूत के तलाक और महिला पर लांछन लगाना है क्रूरता

'बिना सबूत महिला पर लांछन लगाना क्रूरता'

पटना: अधिवक्ता कौशलेंद्र नारायण ने बताया कि पटना उच्च न्यायालय ने संजय कुमार झा द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी से तलाक की मांग की थी। झा ने आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी अपनी बड़ी बहन के पति के साथ आपत्तिजनक स्थिति में पाई गई थीं। 

'आपत्तिजनक स्थिति' और अवैध संबंध पर अदालत की टिप्पणी

ANI से बात करते हुए नारायण ने बताया कि निचली अदालत द्वारा तलाक की याचिका खारिज किए जाने के बाद याचिकाकर्ता ने उच्च न्यायालय का रुख किया था। उन्होंने कहा कि झा ने आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी अपनी बड़ी बहन के पति के साथ अनुचित संबंध रख रही थीं और उन्हें आपत्तिजनक स्थिति में पाया गया था। नारायण ने कहा, याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उनकी पत्नी अपनी बड़ी बहन के पति के साथ अनुचित संबंध रख रही थीं और उन्हें आपत्तिजनक स्थिति में पाया गया था। इसी आधार पर उन्होंने तलाक की मांग की थी। निचली अदालत द्वारा तलाक मंजूर न किए जाने पर उन्होंने उच्च न्यायालय का रुख किया। "आपत्तिजनक स्थिति" शब्द को स्पष्ट करते हुए नारायण ने कहा कि इसके अलग-अलग अर्थ हो सकते हैं और यह अपने आप में किसी अवैध संबंध को साबित नहीं करता है। 

बिना ठोस सबूत के 'आपत्तिजनक स्थिति' का आरोप तलाक का वैध आधार नहीं

नारायण ने कहा, "आपत्तिजनक स्थिति" की अलग-अलग परिभाषाएं हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति केवल सम्मान दिखा रहा हो, बात करते समय कंधे पर हाथ रख रहा हो या बातचीत का तरीका मात्र आकर्षण का संकेत दे रहा हो। नारायण ने कहा कि पर्याप्त सबूत के बिना केवल आरोप लगाना तलाक का वैध आधार नहीं हो सकता। उन्होंने आगे कहा, लेकिन कहीं भी यौन संबंध को दर्शाया या साबित नहीं किया गया- कोई गवाह नहीं था। कोई फोटो नहीं थी, कोई वीडियो नहीं था और न ही कोई पुलिस शिकायत या एफआईआर दर्ज की गई थी। बिना कोई सबूत दिए, केवल आपत्तिजनक स्थिति का आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है।

बिना ठोस सबूत के अवैध संबंध का आरोप है क्रूरता

उन्होंने आगे कहा कि अदालत ने पाया कि भले ही पत्नी को आपत्तिजनक स्थिति में देखा गया हो, तलाक का वैध आधार बनने के लिए अवैध संबंध या यौन संलिप्तता का सबूत होना आवश्यक है। नारायण ने कहा, अदालत का रुख यह है कि भले ही पत्नी आपत्तिजनक स्थिति में थी, जब तक यौन संबंध या अवैध संलिप्तता का सबूत नहीं है केवल देवर के साथ बैठना, जो परिवार के सदस्य आमतौर पर करते हैं, तलाक का वैध आधार नहीं बन सकता। उन्होंने आगे कहा कि अदालत ने याचिका खारिज कर दी, यह देखते हुए कि पत्नी के खिलाफ निराधार आरोप क्रूरता के बराबर हो सकते हैं।

बिना सबूत के महिला की गरिमा पर लांछन लगाना गलत

नारायण ने आगे कहा कि आरोपों को सबूतों से समर्थित होना चाहिए और तलाक मांगने के साधन के रूप में इनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, मुद्दा यह है कि आप अपने लगाए गए आरोप को साबित नहीं कर सके। इसलिए आपका मामला वहीं खत्म हो गया। आप तलाक देकर और एक महिला को दोषी ठहराकर भागना चाहते थे। जब आप एक महिला की गरिमा को तार-तार कर रहे थे, तो अदालत ने मानवीय होने के नाते इसे तुरंत समझ लिया। ऐसी बातें यहां नहीं चलतीं, आपको तथ्य पेश करने होंगे। आपने जो भी कानूनी आधार प्रस्तुत किए थे, वे गलत और अप्रमाणित थे, इसीलिए आपकी याचिका खारिज कर दी गई। 

(इनपुट: ANI)

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