वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन का निधन, हिंदी साहित्य की एक युग की समाप्ति
जबलपुर। वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन नहीं रहे। उन्होंने जबलपुर के एक अस्पताल में बुधवार को अंतिम सांस ली। महाराष्ट्र के अकोला में 21 नवंबर 1936 के जन्मे ज्ञानरंजन ने देश की सबसे प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'पहल' का संपादन किया। इसमें छपना हर साहित्यकार का सपना हुआ करता था। पहल की लोकप्रियता के चलते ही जर्मनी की एक विश्वविद्यालय ने इसके पूरे 125 अंक को डिजिटल फॉर्म में निकाला।
जबलपुर से रहा विशेष लगाव
जबलपुर से उनका विशेष लगाव रहा। उन्होंने कई वर्षों तक जीएस कालेज में अध्यापन भी किया। परिवार में उनकी पत्नी सुनयना, बेता शांतनु, और बेटी वत्सला है। उनकी साहित्य में अमूल्य योगदान के लिए सोवियत लैंड पुरस्कार, साहित्य भूषण सम्मान, अनिल कुमार और सुभद्रा कुमारी चौहान पुरस्कार, मध्य प्रदेश का शिखर सम्मान और ज्ञानपीठ का गरिमा सम्मान से पुरस्कृत किया जा चुका था।
साहित्य के एक युग का अंत
ज्ञानरंज के करीबी कथाकार पंकज स्वामी कहते हैं कि यह साहित्य के एक युग का अवसान है। देश में प्रतिगामी चेतना का स्वर शांत हो गया। कवि विवेक चतुर्वेदी ने कहा, ज्ञानरंजन परसाई के बाद हिंदी साहित्य की सबसे साहित्यिक विभूति थे। उनकी पत्रिका कबाड़खाना काफी लोकप्रिय रही है। आपातकाल के आघातों के बावजूद उन्होंने पहल का संपादन व प्रकाशन निरंतर 35 वर्षों तक किया।
ज्ञानरंजन की कृति
ज्ञानरंजन के 6 कहानी संग्रह प्रकाशित है। भारतीय कथांओं के अलावा अंग्रेजी, जापानी, रूसी और पोल में उनकी कहनियां अनुवादित की गई हैं। मालूम हो कि पूर्वी यूरोप के अनेक विवि में उनकी कहानियां पाठ्यक्रम में शामिल की गई हैं। जबलपुर विवि ने उन्हें मानद डाक्टर और लिटरेचर से सम्मानित किया।