राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले स्वतंत्रता दिव

राष्ट्रपति के स्वतंत्रता दिवस 'एट होम' निमंत्रण में दिखेगी छत्तीसगढ़, गोवा, MP और महाराष्ट्र की सांस्कृतिक झलक

States' Culture to Shine at Rashtrapati Bhavan

नई दिल्ली: राष्ट्रपति भवन में आयोजित होने वाले स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए तैयार किया गया निमंत्रण पत्र भारत की कला, संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण की परंपराओं को दर्शा रहा है। 15 अगस्त 2026 को 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आयोजित 'एट होम' समारोह में मेहमानों को एक खूबसूरत सूती थैले में यह विशेष निमंत्रण दिया जाएगा।

कला और पर्यावरण संरक्षण का अनोखा संगम

एक खूबसूरत सूती बैग में तैयार यह निमंत्रण पत्र भारत की कलात्मक विविधता और पर्यावरण संरक्षण की सदियों पुरानी परंपराओं की झलक पेश करता है। इसमें छत्तीसगढ़, गोवा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की प्रेरणादायक पर्यावरणीय पहल और सतत विकास की परंपराओं को शामिल किया गया है। इन राज्यों की पहाड़ी क्षेत्रों, नदियों, हरियाली और जीवंत कला परंपराओं को इस निमंत्रण के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।

कोंकण की कावी कला से प्रेरित बाहरी आवरण

निमंत्रण पत्र का बाहरी कवर तटीय कोंकण क्षेत्र की प्रसिद्ध कावी कला से प्रेरित है। इस कला में स्थानीय लेटराइट मिट्टी से तैयार लाल-भूरे रंगद्रव्य का इस्तेमाल किया जाता है। कारीगर चूने से पुती सफेद दीवार पर लाल प्लास्टर की ऊपरी परत को काटकर और खुरचकर सुंदर आकृतियां तैयार करते हैं। निमंत्रण कार्ड के बाहरी आवरण पर लगी धातु की घंटी भी खास आकर्षण का केंद्र है।

बस्तर के आदिवासी लोहारों की कला की झलक

निमंत्रण पत्र के साथ लगी लोहे की घंटी छत्तीसगढ़ के बस्तर के कुशल आदिवासी लोहारों द्वारा बनाई गई है। इसे पुनर्चक्रित स्क्रैप लोहे से तैयार किया गया है, जो पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय कला दोनों को दर्शाता है। निमंत्रण बैग में हाथ से बुना हुआ माहेश्वरी डिजाइन का स्टोल भी शामिल किया गया है। यह स्टोल मध्य प्रदेश के माहेश्वर की पारंपरिक दोहरी रेशम और सूती बुनाई तकनीक से तैयार किया गया है। इसमें छत्तीसगढ़, गोवा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की वस्त्र परंपराओं के अनोखे क्षेत्रीय रूपांकनों को शामिल किया गया है।

मध्य प्रदेश की बाघ प्रिंट कला को मिला स्थान

निमंत्रण में मध्य प्रदेश के धार जिले के बाघ कस्बे की प्रसिद्ध बाघ प्रिंट कला को भी शामिल किया गया है। इसमें हाथ से नक्काशी किए गए लकड़ी के ब्लॉक और प्राकृतिक वनस्पति आधारित रंगों का उपयोग किया जाता है। इस कला में गहरे काले रंग और ज्यामितीय व पुष्प डिजाइनों का इस्तेमाल किया जाता है, जो इसे खास पहचान देते हैं।

बस्तर की लौह-शिल्प कला की झलक

डिस्प्ले फ्रेम में छत्तीसगढ़ के बस्तर की विश्व प्रसिद्ध आदिवासी कला 'लौह-शिल्प' या पिटवा से बनी मूर्तियां प्रदर्शित की गई हैं। यह पर्यावरण-अनुकूल कला पुनर्चक्रित स्क्रैप लोहे को सुंदर मूर्तियों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं में बदलने की परंपरा को दर्शाती है। महाराष्ट्र की प्रसिद्ध वारली कला भी निमंत्रण पत्र का हिस्सा है। यह भारत की सबसे प्राचीन जनजातीय कला विधाओं में से एक मानी जाती है। इसमें चावल के पेस्ट से बनी सफेद आकृतियों के जरिए प्रकृति, दैनिक जीवन, आध्यात्मिक मान्यताओं और जनजातीय संस्कृति को दर्शाया जाता है।

गोवा के खजान क्षेत्रों को दर्शाती अज़ुलेजो टाइल

निमंत्रण पत्र पर लगी अज़ुलेजो टाइल गोवा के खजान क्षेत्रों को प्रदर्शित करती है। ये क्षेत्र सामुदायिक रूप से प्रबंधित तटीय आर्द्रभूमि हैं, जिन्हें मैंग्रोव वनों और दलदलों से विकसित किया गया है। इन प्राचीन कृषि-जलीय पारिस्थितिकी तंत्रों में बांधों, तटबंधों और जल निकासी प्रणालियों के जरिए खेती, मछली पालन और नमक उत्पादन को बढ़ावा दिया जाता है।

भील चित्रकला से सजेगी सांस्कृतिक विरासत

मध्य प्रदेश की भील चित्रकला को भी इस विशेष निमंत्रण में जगह दी गई है। यह कला नीम की टहनियों से बनाए गए बिंदुओं के जटिल पैटर्न के लिए प्रसिद्ध है। इसमें प्रकृति, पौराणिक कथाओं और जनजातीय जीवन को रंगों और आकृतियों के माध्यम से दर्शाया जाता है। राष्ट्रपति भवन का यह विशेष निमंत्रण पत्र केवल एक आमंत्रण नहीं, बल्कि भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत, स्थानीय शिल्प और पर्यावरण संरक्षण की भावना का प्रतीक बनकर सामने आया है।

यह भी पढ़े: अनुच्छेद 370 हटने से सामाजिक न्याय और एकीकरण को मिली नई गति: कविंदर गुप्ता