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बांग्लादेश: स्वतंत्रता दिवस समारोह में गीता पाठ रोकने के निर्देश पर विवाद, हिंदू संगठनों में आक्रोश

Government Directive

ढाका, 27 मार्च 2026: बांग्लादेश में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान एक विवाद सामने आया है, जहां हिंदू धर्मग्रंथ श्रीमद् भगवद् गीता के पाठ को लेकर निर्देश दिए जाने पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। इस घटना ने धार्मिक सहिष्णुता और परंपराओं को लेकर बहस छेड़ दी है।

क्या है पूरा मामला?

26 मार्च 2026 को बांग्लादेश के 56वें स्वतंत्रता दिवस और राष्ट्रीय दिवस के मौके पर राजशाही-1 (तनोर-गोदागरी) क्षेत्र के तनोर उपज़िला में एक सरकारी कार्यक्रम आयोजित किया गया था। आरोप है कि इस कार्यक्रम के दौरान बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के नायब-ए-अमीर और स्थानीय सांसद प्रोफेसर मुजीबुर रहमान ने श्रीमद् भगवद् गीता के पाठ को रोकने का निर्देश दिया।

परंपरा के खिलाफ बताया गया कदम

बांग्लादेश में स्वतंत्रता दिवस और अन्य सरकारी आयोजनों की शुरुआत आमतौर पर विभिन्न धर्मों के पवित्र ग्रंथों के पाठ से होती है। इनमें कुरान के साथ-साथ गीता के अंशों का पाठ भी पारंपरिक रूप से शामिल रहा है। ऐसे में गीता पाठ को रोकने का निर्देश इस स्थापित परंपरा के खिलाफ माना जा रहा है।

हिंदू संगठनों का कड़ा विरोध

इस घटना के बाद बांग्लादेश राष्ट्रीय हिंदू महागठबंधन (केंद्रीय कार्यकारी समिति) ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। संगठन के महासचिव डॉ. एम.के. रॉय ने बयान जारी कर इस कदम की निंदा करते हुए सवाल उठाया कि एक महत्वपूर्ण सरकारी कार्यक्रम में ऐसा निर्देश कैसे दिया जा सकता है। उन्होंने संबंधित अधिकारियों से इस मामले में स्पष्टीकरण की मांग की है और इसे सांप्रदायिक व भेदभावपूर्ण व्यवहार करार दिया।

यूएनओ के हस्तक्षेप से हुआ गीता पाठ

बताया जा रहा है कि यह निर्देश तनोर के उपजिला निर्बाही अधिकारी (यूएनओ) को दिया गया था। हालांकि, यूएनओ नाइमा खान के हस्तक्षेप के बाद कार्यक्रम में श्रीमद् भगवद् गीता का पाठ भी शामिल किया गया और समारोह परंपरागत तरीके से संपन्न हुआ। हिंदू महागठबंधन ने यूएनओ नाइमा खान के इस कदम के लिए उनका आभार भी व्यक्त किया।

जवाबदेही की मांग

संगठन ने सरकार से मांग की है कि इस मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। साथ ही, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के केंद्रीय नेतृत्व से भी इस मुद्दे पर उचित कदम उठाने का आग्रह किया गया है।

धार्मिक सौहार्द पर उठे सवाल

इस पूरे घटनाक्रम ने बांग्लादेश में धार्मिक सौहार्द और समानता को लेकर एक नई बहस खड़ी कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय आयोजनों में सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान बनाए रखना देश की सामाजिक एकता के लिए बेहद जरूरी है।

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