समरकंद में एशियाई संवैधानिक न्यायालयों के सम्मेलन

न्याय व्यवस्था में तकनीक के विस्तार पर AI को लेकर CJI ने किया सावधान

AI न्यायिक फैसलों का विकल्प नहीं: CJI

समरकंद: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने गुरुवार को कहा कि न्याय तक पहुंच बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाना चाहिए, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता न्यायिक कौशल या निर्णय लेने की क्षमता का स्थान नहीं ले सकती, जो न्यायाधीशों के पास ही रहनी चाहिए। उज़्बेकिस्तान के समरकंद में एशियाई संवैधानिक न्यायालयों और समकक्ष संस्थानों के संघ के 7वें सम्मेलन को संबोधित करते हुए, मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्यायालयों के सामने चुनौती यह है कि वे अपने संवैधानिक कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान रहते हुए प्रौद्योगिकी को अपनाएं।

डिजिटल न्याय से बढ़ी पहुंच

उन्होंने कहा, प्रौद्योगिकी लाखों लोगों की पहुंच में न्याय ला सकती है, लेकिन पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना यह उन नागरिकों को ही वंचित कर सकती है जिनकी सेवा के लिए यह बनाई गई है और जनता के विश्वास को कम कर सकती है। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण डिजिटलीकरण को मौजूदा प्रक्रियाओं के मात्र कम्प्यूटरीकरण के रूप में नहीं, बल्कि नागरिकों को ध्यान में रखते हुए उन्हें पुनर्गठित करने के अवसर के रूप में देखना है। भारत के डिजिटल न्यायिक परिवर्तन पर नजर डालते हुए मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ई-फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल केस प्रबंधन और संविधान पीठ की कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग ने दूरी और लागत के बोझ को कम किया है और न्यायालयों तक पहुंच में सुधार किया है।

कोविड काल में डिजिटल सुनवाई का बढ़ा इस्तेमाल

उन्होंने कहा कि कोविड-19 महामारी ने डिजिटल बुनियादी ढांचे के महत्व को प्रदर्शित किया है, जिसमें अकेले सर्वोच्च न्यायालय ने मार्च 2020 से जून 2024 के बीच वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 7.5 लाख से अधिक सुनवाई की हैं। भाषा संबंधी बाधाओं को दूर करने के बारे में मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय भाषाओं में निर्णयों का अनुवाद करने के लिए एआई-सहायता प्राप्त उपकरण SUVAS विकसित किया है। उन्होंने बताया कि 18 भाषाओं में 83,000 से अधिक अनुवाद प्रकाशित किए जा चुके हैं। 

Su-Sahayak से केस की जानकारी आसान

उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर स्थित एआई-संचालित चैटबॉट Su-Sahayak का भी उल्लेख किया, जो वादियों, वकीलों और आम जनता को मामले की स्थिति, वाद सूची, आदेश, निर्णय और ई-सेवाओं की जानकारी प्राप्त करने में सक्षम बनाता है। उन्होंने कहा, व्यापक उद्देश्य न्यायालय को नागरिक के लिए सुलभ बनाना है, क्योंकि न्याय तक पहुंच अधूरी है अगर न्यायालय के दरवाजे खुले हों लेकिन उसकी प्रक्रियाएं जटिल बनी रहें। मुख्य न्यायाधीश ने "एक मामला, एक डेटा" पहल का भी उल्लेख किया, जिसका उद्देश्य न्यायपालिका के सभी स्तरों पर मामले की जानकारी को एकीकृत करना और दोहराव और देरी को कम करना है।

AI मददगार, लेकिन न्यायिक फैसलों में इंसानी भूमिका सर्वोपरि

हालांकि, उन्होंने अदालतों द्वारा डेटा और एआई पर बढ़ती निर्भरता को देखते हुए सुरक्षा उपायों की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जून 2026 में जारी अदालतों में एआई के उपयोग पर सर्वोच्च न्यायालय के मसौदा नियम "मानव प्रधानता" के सिद्धांत पर आधारित हैं। कांत ने कहा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता न्यायिक अनुसंधान में सहायक हो सकती है और न्यायालय की प्रक्रियाओं का समर्थन कर सकती है, लेकिन यह न्यायिक सूझबूझ या निर्णय लेने की क्षमता का स्थान कभी नहीं ले सकती, जो हमेशा न्यायाधीश के पास ही रहनी चाहिए। 

(इनपुट: ANI)

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