भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में जलवायु प

भारत ने UN में जलवायु परिवर्तन से निपटने में NGT और स्वतंत्र न्यायपालिका की भूमिका पर दिया जोर

India at UN Emphasizes NGT and Judiciary Role in Climate Action

न्यूयॉर्क। भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में जलवायु परिवर्तन से निपटने के अपने संकल्प को दोहराते हुए पर्यावरण संरक्षण में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और स्वतंत्र न्यायपालिका की भूमिका पर जोर दिया। भारत ने कहा कि जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए समानता, जलवायु न्याय और सतत विकास पर आधारित दृष्टिकोण जरूरी है। देश का मजबूत संवैधानिक और कानूनी ढांचा पर्यावरण संरक्षण के प्रयासों को समर्थन देता है।

जलवायु परिवर्तन से विकास और आजीविका पर असर

संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भारत की ओर से विदेश मंत्रालय की उप सचिव बरखा ताम्रकार ने न्यायाधीशों और वकीलों की स्वतंत्रता पर विशेष प्रतिवेदक की रिपोर्ट पर बयान दिया। इस रिपोर्ट का शीर्षक था, 'एक जरूरी और अस्तित्वगत खतरा: जलवायु संकट से निपटने में न्याय प्रणाली की भूमिका।' अपने संबोधन में ताम्रकार ने कहा कि भारत जलवायु परिवर्तन को एक गंभीर वैश्विक चुनौती मानता है। इसका प्रभाव विकास, लोगों की आजीविका और मानवाधिकारों पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि इस चुनौती से निपटने के लिए भारत का दृष्टिकोण समानता, जलवायु न्याय और सतत विकास के सिद्धांतों पर आधारित है।

CBDR-RC सिद्धांत पर भारत का जोर

बरखा ताम्रकार ने कहा कि भारत का जलवायु संबंधी दृष्टिकोण 'साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों और संबंधित क्षमताओं' (CBDR-RC) के सिद्धांत पर भी आधारित है। यह सिद्धांत जलवायु परिवर्तन से निपटने में सभी देशों की साझा जिम्मेदारी को स्वीकार करता है, साथ ही उनकी अलग-अलग परिस्थितियों और क्षमताओं को भी ध्यान में रखता है। भारत की संस्थागत और कानूनी व्यवस्था का उल्लेख करते हुए ताम्रकार ने कहा कि देश में पर्यावरण संरक्षण को संविधान, व्यापक कानूनों, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और स्वतंत्र न्यायपालिका का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने कहा कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने जीवन और समानता के मौलिक अधिकारों को जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से बचाने के लिए आवश्यक सुरक्षा उपायों के रूप में मान्यता दी है।

न्यायिक स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए प्रशिक्षण व्यवस्था

भारत ने न्यायिक मानकों को बनाए रखने के लिए देश में पारदर्शी और संस्थागत निगरानी के तहत संचालित न्यायिक प्रशिक्षण व्यवस्था का भी उल्लेख किया। इसमें राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी के माध्यम से दिया जाने वाला प्रशिक्षण शामिल है। इस व्यवस्था का उद्देश्य न्यायिक निष्पक्षता को मजबूत करना और न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखना है। इस बीच, शुक्रवार को आयोजित नौवें वार्षिक भारत-UN विकास साझेदारी कोष कार्यक्रम में भाग लेने वाले साझेदार देशों के स्थायी प्रतिनिधियों और ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधियों ने सतत सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए भारत के समर्थन की सराहना की। 22 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा में आयोजित इस कार्यक्रम में लाओस, श्रीलंका, तंजानिया, माइक्रोनेशिया, मोल्दोवा, मोरक्को, सेंट लूसिया, क्यूबा, मोजाम्बिक और अन्य देशों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

150 मिलियन डॉलर का फंड विकासशील देशों की करता है मदद

वर्ष 2017 में स्थापित 150 मिलियन डॉलर का भारत-UN विकास साझेदारी कोष भारत सरकार के समर्थन और नेतृत्व में संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के सहयोग से संचालित किया जाता है। इस कोष का उद्देश्य विकासशील देशों में उनकी जरूरतों के अनुरूप सतत विकास परियोजनाओं को समर्थन देना है। इन परियोजनाओं का संचालन संबंधित देशों के स्वामित्व और नेतृत्व में किया जाता है। इसमें विशेष रूप से सबसे कम विकसित देशों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों पर ध्यान दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां साझेदार देशों की सरकारों के साथ मिलकर इन परियोजनाओं को लागू करती हैं।

(ANI)

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