विश्व बैंक के एक नए आकलन ने पाकिस्तान में प्रांतीय

विश्व बैंक की रिपोर्ट में खुलासा: पाकिस्तान में प्रांतीय खर्च में भारी असमानता, राजधानियों को मिल रहा सबसे अधिक बजट

Pakistan Faces Major Provincial Spending Inequality

इस्लामाबाद (पाकिस्तान)। विश्व बैंक के एक नए आकलन ने पाकिस्तान में प्रांतीय सार्वजनिक व्यय में भारी असमानताओं को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय विकेंद्रीकरण के वर्षों बाद भी प्रांतीय राजधानियों को अन्य जिलों की तुलना में प्रति व्यक्ति कहीं अधिक धन मिल रहा है।

क्वेटा और लाहौर में सबसे बड़ा खर्च अंतर

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार, विश्व बैंक की स्ट्रेंथनिंग फिस्कल फेडरलिज्म रिपोर्ट में बताया गया है कि क्वेटा में प्रति व्यक्ति प्रांतीय व्यय 57,000 रुपये तक पहुंच गया, जबकि बलूचिस्तान के बाकी हिस्सों में यह केवल 12,000 रुपये रहा। यानी लगभग 475 प्रतिशत का अंतर दर्ज किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, लाहौर में प्रति व्यक्ति 31,000 रुपये खर्च किए गए, जबकि पंजाब के अन्य जिलों में यह आंकड़ा 7,000 रुपये रहा। वहीं पेशावर में प्रति व्यक्ति लगभग 35,000 रुपये खर्च हुए, जबकि खैबर पख्तूनख्वा के अन्य क्षेत्रों में यह 10,000 रुपये रहा।

कराची में भी दिखी असमानता

रिपोर्ट में कहा गया है कि कराची में अंतर सबसे कम था, लेकिन वहां भी अन्य जिलों की तुलना में प्रति व्यक्ति 178 प्रतिशत अधिक खर्च किया गया। हालांकि 2009 के बाद से यह अंतर कुछ कम हुआ है, लेकिन प्रांतीय राजधानियों को अब भी विकास संसाधनों का बड़ा हिस्सा मिल रहा है।

गरीब जिलों को नहीं मिल रहा पर्याप्त निवेश

विश्व बैंक के अनुसार, संपन्न जिलों को लगातार अधिक बजट आवंटन मिलता है, जबकि गरीब क्षेत्र कम निवेश के दुष्चक्र में फंसे हुए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिला स्तर पर वित्तीय आवंटन गरीबी, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं या बुनियादी ढांचे जैसी वास्तविक जरूरतों के आधार पर नहीं किया जा रहा है।

बलूचिस्तान को लेकर जताई चिंता

रिपोर्ट में कहा गया है कि यह स्थिति विशेष रूप से बलूचिस्तान के लिए चिंताजनक है, जहां लंबे समय से विकास की कमी और सीमित रोजगार के अवसरों को अशांति की प्रमुख वजह माना जाता रहा है। बजट अधिशेष होने के बावजूद क्वेटा को पूरे प्रांत की तुलना में कहीं अधिक व्यय मिल रहा है।

स्थानीय शासन व्यवस्था पर भी सवाल

विश्व बैंक ने स्थानीय शासन व्यवस्था को भी कमजोर बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, प्रांतीय वित्त आयोग काफी हद तक निष्क्रिय हैं और स्थानीय सरकारों को प्रांतीय संसाधनों का बहुत छोटा हिस्सा ही मिल रहा है। संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद स्थानीय सरकारों द्वारा प्रबंधित कुल सरकारी व्यय का हिस्सा 2005 के लगभग 10 प्रतिशत से घटकर 2024 में केवल 4.7 प्रतिशत रह गया है।

शिक्षा और स्वास्थ्य खर्च की प्रभावशीलता पर सवाल

रिपोर्ट में शिक्षा और स्वास्थ्य पर बढ़े खर्च की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाए गए हैं। द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के अनुसार, वित्त वर्ष 2009 से 2023 के बीच पंजाब, सिंध और बलूचिस्तान ने शिक्षा बजट में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की, लेकिन कई क्षेत्रों में स्कूली नामांकन और साक्षरता दर या तो स्थिर रही या उसमें गिरावट दर्ज की गई।

(यह खबर ANI से सीधे संपादित की गई है।)

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