पाकिस्तान ने खैबर पख्तूनख्वा में आपातकाल और गवर्नर

पाकिस्तान में लोकतंत्र पर बड़ा प्रहार: खैबर पख्तूनख्वा में गवर्नर शासन, इमरान की पार्टी बेदखल

Police guard a road leading to Red Zone, in Peshawar, Khyber Pakhtunkhwa province, Pakistan

इस्लामाबाद (पाकिस्तान)। दशकों तक सीमा पार आतंकवाद को अपनी सरकारी नीति के रूप में इस्तेमाल करने वाला पाकिस्तान अब खुद गंभीर आंतरिक संकट में घिर गया है। पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान ने तानाशाही रवैया अपनाते हुए खैबर पख्तूनख्वा (KPK) प्रांत में आपातकाल और गवर्नर शासन लागू कर दिया है। इसके साथ ही, जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी 'पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ' (PTI) के नेतृत्व वाली प्रांतीय सरकार व्यावहारिक रूप से निलंबित हो गई है।

संविधान के अनुच्छेदों का इस्तेमाल कर सत्ता पर कब्जा

यह आपातकालीन आदेश राष्ट्रीय संविधान के अनुच्छेद 232 और 234 का हवाला देते हुए लागू किया गया है। पूर्व प्रधानमंत्री को जेल भेजने और संवैधानिक संशोधनों के ज़रिये न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सीमित करने के बाद, अब विपक्षी दल की अंतिम प्रांतीय सरकार को भी छीन लिया गया है। यह पाकिस्तान में ढहते लोकतांत्रिक ढांचे पर एक और करारा प्रहार है।

'पिछवाड़े में सांप पालने' का खामियाजा

पाकिस्तान में उपजा आतंकवाद उसकी पांच दशकों पुरानी 'रणनीतिक गहराई' (Strategic Depth) की नीति का नतीजा है। अमेरिका की पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने चेतावनी दी थी कि "आप अपने घर के पिछवाड़े में सांप पालकर यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे सिर्फ पड़ोसियों को काटेंगे; अंततः वे अपने पालने वालों को ही डसेंगे।"

तहरीक-ए-तालिबान (TTP) को बढ़ावा और विफल नीतियां

सबक लेने के बजाय पाकिस्तान ने आतंकी गुटों को 'अच्छे' और 'बुरे' की श्रेणियों में बांटा। जनरल बाजवा के कार्यकाल के दौरान 'तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान' (TTP) के आतंकियों को पूर्व FATA और खैबर पख्तूनख्वा के इलाकों में फिर से बसाया गया। अब जब वहां सुरक्षा स्थिति बेकाबू हो चुकी है, तो जवाब में सीधे केंद्र का शासन थोप दिया गया है।

12 जिलों में सीधे सैन्य और संघीय नियंत्रण

हालात सुधारने के बजाय खैबर पख्तूनख्वा के 12 जिलों में आपातकाल लगाकर उन्हें सीधे संघीय नियंत्रण में ला दिया गया है। इन क्षेत्रों में न्यायिक और कार्यकारी शक्तियों के बीच के संवैधानिक अंतर को खत्म कर दिया गया है। नागरिक प्रशासन की जगह अब सेना और गैर-निर्वाचित अधिकारियों का दबदबा स्पष्ट दिखने लगा है।

विपक्ष पर बर्बर कार्रवाई और मानवाधिकार उल्लंघन

स्थानीय नागरिकों पर एक बार फिर सैन्य अभियानों (जैसे ज़र्ब-ए-अज़ब और रद्द-उल-फ़साद) जैसी यातनाओं का खतरा मंडरा रहा है। सरकार राजनीतिक विरोध को सुरक्षा खतरा मानकर विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर रही है, उनके घरों पर छापे मार रही है और प्रदर्शनकारियों पर आंसू गैस व गोलियां चला रही है। मीडिया पर भी सख्त सेंसरशिप लगा दी गई है। ​(भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)

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