रूस ने भारत तक रेल कॉरिडोर का दिया बड़ा प्रस्ताव, ईरान-पाकिस्तान के रास्ते बदलेगा ट्रेड रूट?
मॉस्को (रूस)। वैश्विक व्यापारिक मार्गों पर मंडराते भू-राजनीतिक संकट के बीच रूस ने भारत के साथ रणनीतिक और आर्थिक सहयोग को एक नए स्तर पर ले जाने का बड़ा प्रस्ताव रखा है। रूस के उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन (Marat Khusnullin) ने कहा है कि रूस को हिंद महासागर तक सीधी रेल लिंक के निर्माण की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इस महत्वाकांक्षी परियोजना का मुख्य उद्देश्य बोस्फोरस और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील समुद्री मार्गों से जुड़े ट्रांजिट जोखिमों और बाधाओं को कम करना है।
भू-राजनीतिक और व्यापारिक घटनाक्रम
- वैकल्पिक कॉरिडोर की रूपरेखा: इस प्रस्तावित रेल नेटवर्क के लिए तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से गुजरने वाले मार्गों पर विचार किया जा रहा है।
- समुद्री मार्ग पर बढ़ता तनाव: अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच चल रहे सैन्य संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है।
- तेहरान की कड़ी कार्रवाई: ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) द्वारा अमेरिका और इजराइल से जुड़े जहाजों के लिए इस क्षेत्र में समुद्री नाकाबंदी की घोषणा की गई है।
- वैश्विक ऊर्जा व्यापार पर असर: होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग 25 प्रतिशत और एलएनजी (LNG) शिपमेंट का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है।
रूस और भारत के बीच सीधी माल ढुलाई की तैयारी
रूस की सरकारी समाचार एजेंसी 'तास' (TASS) को दिए एक साक्षात्कार में उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने स्पष्ट किया कि भारत तक पहुंच प्रदान करने वाला कोई भी वैकल्पिक मार्ग स्वीकार्य और व्यावहारिक होगा। यदि यह रेल नेटवर्क धरातल पर उतरता है, तो इससे रूस और भारत के बीच सीधे तौर पर जमीनी माल ढुलाई (Overland Rail Freight Access) का रास्ता खुल जाएगा।
मरात खुसनुलिन ने कहा, "हिंद महासागर के लिए एक रेल लिंक का भी पता लगाया जाना चाहिए। बोस्फोरस और होर्मुज जलडमरूमध्य से संबंधित जोखिमों के कारण तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के माध्यम से वैकल्पिक मार्गों की आवश्यकता हो सकती है। भारत को कनेक्टिविटी प्रदान करने वाले किसी भी विकल्प पर विचार किया जाएगा।"
मध्य पूर्व में सैन्य संघर्ष और समुद्री नाकाबंदी
यह पूरा प्रस्ताव ऐसे समय में सामने आया है जब मध्य Middle East में भू-राजनीतिक उथल-पुथल चरम पर है। इसी साल 28 फरवरी को, अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान के मुख्य शहरी केंद्रों (तेहरान समेत) को निशाना बनाकर संयुक्त सैन्य हमले किए गए थे।
इसके जवाब में ईरान के आईआरजीसी (IRGC) ने इजराइल के ठिकानों के साथ-साथ बहरीन, जॉर्डन, इराक, कतर, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। इसके बाद तेहरान ने उन सभी जहाजों के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी की घोषणा कर दी, जो इस सैन्य कार्रवाई में शामिल अमेरिका, इजराइल या उनके सहयोगी देशों से जुड़े हैं। इस रणनीतिक मार्ग के बंद होने या बाधित होने से वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भारी दबाव बना हुआ है।
घरेलू अर्थव्यवस्था और निर्माण क्षेत्र को लेकर रूसी नीति
अंतरराष्ट्रीय रसद गलियारों (Logistics Corridors) के अलावा, मरात खुसनुलिन ने देश के भीतर की आर्थिक व्यवस्था पर भी बात की। उन्होंने जोर देकर कहा कि रूस के निर्माण (Construction) क्षेत्र को दीर्घकालिक और निरंतर वित्तीय सहायता की सख्त आवश्यकता है।
उन्होंने बताया कि देश का घरेलू निर्माण उद्योग वर्तमान में सालाना आधार पर एक ट्रिलियन रूबल (एक खरब रूबल) अतिरिक्त राशि खपाने की क्षमता रखता है। खुसनुलिन ने कहा, "निर्माण उद्योग पहले से ही सालाना एक ट्रिलियन रूबल का अतिरिक्त बोझ उठाने में सक्षम है। हालांकि, यदि अगले पांच वर्षों के लिए इस तरह की वित्तीय मात्रा सुरक्षित कर ली जाती है, तो अपनी क्षमता का विस्तार करना और भी अधिक निर्माण कार्य करना संभव हो जाएगा।"
प्रभाव विश्लेषण: भारत के लिए इसका क्या मतलब?
सवाल: रूस-भारत के बीच सीधी रेल कनेक्टिविटी बनने से क्या बदलेगा? अगर प्रस्तावित नेटवर्क वास्तविकता में बदलता है, तो रूस से भारत तक माल ढुलाई के लिए एक वैकल्पिक ओवरलैंड रूट उपलब्ध हो सकता है। इससे समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम करने का विकल्प मिलेगा।
सवाल: होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट इस प्रस्ताव से कैसे जुड़ा है? होर्मुज वैश्विक तेल और LNG व्यापार का अहम समुद्री chokepoint है। वहां सैन्य तनाव या नाकाबंदी से समुद्री परिवहन प्रभावित होने की स्थिति में वैकल्पिक भूमि-आधारित कॉरिडोर रणनीतिक महत्व हासिल कर सकते हैं।
सवाल: क्या यह रेल मार्ग तुरंत बन सकता है? स्रोत में इस परियोजना के लिए कोई समयसीमा नहीं दी गई है। प्रस्तावित रास्ता तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होकर भारत तक पहुंचने की संभावना पर आधारित है। इसलिए इसके वास्तविक क्रियान्वयन के लिए संबंधित देशों के बीच कनेक्टिविटी और ट्रांजिट व्यवस्था सहित कई स्तरों पर सहमति की जरूरत होगी। (भाषांतर: Ravi Pandey । इनपुट: ANI)
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