सिंध में कानून कागजों तक सीमित, महिला कृषि श्रमिक अब भी अधिकारों से वंचित
सिंध (पाकिस्तान)। सिंध महिला कृषि श्रमिक अधिनियम, 2019 को लागू करने में लगातार हो रही देरी ने पाकिस्तान की लाखों ग्रामीण महिलाओं को उन अधिकारों से वंचित कर दिया है जिनका वादा इस कानून के तहत किया गया था। मीरपुरखास जिले में हारी वेलफेयर एसोसिएशन (HWA) द्वारा आयोजित एक सेमिनार में महिला कृषि श्रमिकों की निरंतर उपेक्षा पर प्रकाश डाला गया। ये महिलाएँ आज भी उन बुनियादी लाभों से दूर हैं जिनकी कल्पना इस कानून में की गई थी।
लाखों महिलाएं बिना पहचान और सुरक्षा के काम करने को मजबूर
स्थानीय मीडिया 'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के मुताबिक, कार्यक्रम को संबोधित करते हुए HWA के अध्यक्ष अकरम अली खसखेली ने कहा कि सिंध के ग्रामीण इलाकों में लगभग 1.5 करोड़ महिलाएँ कृषि, पशुपालन और मत्स्य पालन से जुड़ी हैं, लेकिन वे आज भी बिना किसी कानूनी सुरक्षा या पहचान के काम कर रही हैं। उन्होंने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद इन महिलाओं को उचित मजदूरी, स्वास्थ्य सुविधाओं और शिक्षा के अवसरों से वंचित रखा जा रहा है।
कम मजदूरी और कठिन हालात में काम करने की मजबूरी
खसखेली ने आगे बताया कि महिला मजदूर आमतौर पर प्रतिदिन 500 से 700 पाकिस्तानी रुपये कमाती हैं और अक्सर 8 घंटे से अधिक समय तक ऐसी परिस्थितियों में काम करती हैं जो उनके स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं। ये महिलाएँ कपास चुनने, मिर्च की कटाई, खजूर प्रसंस्करण, केले की खेती और गेहूं उगाने जैसे कठिन कामों में शामिल हैं, फिर भी उनके काम को कम आंका जाता है और उसे उचित पहचान नहीं मिलती।
कानून में अधिकार मजबूत, लेकिन जमीन पर हकीकत कमजोर
2019 के कानून के तहत, महिला कृषि श्रमिक औपचारिक रोजगार अनुबंध, समान वेतन, 120 दिनों के सवैतनिक मातृत्व अवकाश और बीमारी की छुट्टी की हकदार हैं। यह कानून उन्हें यूनियन बनाने का अधिकार भी देता है और सिंध श्रम एवं मानव संसाधन विभाग को उन्हें पंजीकृत करने का निर्देश देता है। इसके अतिरिक्त, इसमें कार्यस्थल पर उत्पीड़न, दुर्व्यवहार और लिंग आधारित भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा के प्रावधान भी शामिल हैं।
अधिकारियों पर सवाल, बदलाव अब भी दूर की बात
सेमिनार में वक्ताओं ने इन कानूनी प्रावधानों को अमल में लाने में विफल रहने पर अधिकारियों की आलोचना की। खसखेली ने कहा कि यह कानून केवल कागजों पर मौजूद है और जमीनी स्तर पर इसका कोई सार्थक कार्यान्वयन नहीं हुआ है। इन चिंताओं को दोहराते हुए मीरपुरखास की डिप्टी मेयर सुमेरा बलूच ने कहा कि महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सरकारी प्रयास जारी हैं, हालांकि कार्यकर्ताओं का तर्क है कि अभी भी वास्तविक प्रगति दिखाई नहीं दे रही है।
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