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धिरौली कोल ब्लॉक के लिए कट रहे हैं लाखों पेड़...

धिरौली कोल ब्लॉक के लिए कट रहे हैं लाखों पेड़, मिटेगा हरियाली का रास्ता

सिंगरौली। जिले की सरई तहसील से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाने वाली एक बेहद चिंताजनक और...

धिरौली कोल ब्लॉक के लिए कट रहे हैं लाखों पेड़ मिटेगा हरियाली का रास्ता

धिरौली कोल ब्लॉक के लिए कट रहे हैं लाखों पेड़, मिटेगा हरियाली का रास्ता |

सिंगरौली। जिले की सरई तहसील से पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाने वाली एक बेहद चिंताजनक और हरी-भरी धरा को मिटाने वाली तस्वीर उभरी है। धिरौली कोल ब्लॉक के निर्माण के लिए क्षेत्र के घने जंगलों को समाप्त कर हरियाली को समाप्त किया जा रहा है। हरियाली और घने जंगलों से भरा-पड़ा यह इलाका अब यह हमेशा के लिए समाप्त होने की कगार पर पहुंच गया है।

​​40 हजार से अधिक पेड़ों की हुई है कटाई

इस कोयला खनन परियोजना के लिए कुल 5.70 लाख (लगभग 6 लाख) पेड़ काटे जाने का अनुमान है। वन क्षेत्र में रोज हजारों पेड़ों पर आरी चल रही है। अब तक लगभग 72 से 75 हेक्टेयर का हरा-भरा वन क्षेत्र पूरी तरह साफ किया जा चुका है, जिसमें 40 हजार से अधिक पेड़ काटे जा चुके हैं।

काले हीरे (कोयला भंडार) की ललक

धिरौली कोल ब्लॉक के तहत स्ट्राटाटेक मिनरल प्राइवेट लिमिटेड (महान एनर्जन लिमिटेड - अडानी ग्रुप की सहायक कंपनी) को कुल 2,672 हेक्टेयर जमीन आवंटित की गई है, जिसमें 1,335.35 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि शामिल है। इस ब्लॉक में लगभग 586.39 मिलियन टन कोयला भंडार होने का अनुमान लगाया गया है।

​छिरौली पंचायत सबसे अधिक प्रभावित

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस परियोजना से प्रभावित होने वाला कुल वन क्षेत्र 1397.54 हेक्टेयर है। स्थानीय ग्राम सभाओं के प्रस्तावों में यह आंकड़ा 1436.35 हेक्टेयर बताया गया है। ग्राम पंचायत धिरौली में सबसे अधिक 60.89 हेक्टेयर राजस्व वन भूमि प्रभावित हो रही है।

​इसलिए हो रहा परियोजना का विरोध

​इस बड़े पैमाने पर होने वाले वनों के विनाश (Deforestation) के कारण स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक भारी विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। यह जंगल स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के लिए जीवन रेखा है। वे महुआ, तेंदू पत्ता, जड़ी-बूटियों और ईंधन की लकड़ी जैसी वनोपजों पर अपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं। जंगल कटने से उनके सामने विस्थापन और रोजगार का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। कांग्रेस और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का आरोप है कि वन अधिकार अधिनियम (FRA, 2006) और पेसा कानून (PESA Act, 1996) के प्रावधानों का उल्लंघन करके, ग्राम सभाओं की सहमति के बिना यह काम किया जा रहा है।

​कानूनी लड़ाई और NGT का हस्तक्षेप

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने इस परियोजना को दी गई पर्यावरणीय मंजूरियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किए हैं। याचिकाओं में यह भी दावा किया गया है कि प्रस्तावित हाथियों का गलियारा (Elephant Corridor) इसी धिरौली कोल ब्लॉक क्षेत्र से होकर गुजरता है।

​मप्र सरकार का पक्ष 

​मध्य प्रदेश सरकार और वन विभाग का कहना है कि ​इस कोयला ब्लॉक परियोजना को केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 9 मई 2025 को अंतिम मंजूरी (Stage II Clearance) दी गई थी। वनों की इस कटाई की भरपाई के लिए आगर मालवा, रायसेन, शिवपुरी और सागर जैसे अन्य जिलों में 13.97 लाख से अधिक नए पौधे रोपे जाएंगे ताकि पर्यावरणीय संतुलन बना रहे।

​और खत्म हो जाएगी हरी-भरी वादी

विपक्ष और स्थानीय निवासियों का तर्क है कि सिंगरौली के जंगलों को काटकर सैकड़ों किलोमीटर दूर दूसरे जिलों में पौधे लगाने से यहाँ के स्थानीय पर्यावरण, वन्यजीवों और विस्थापित होने वाले लोगों को कोई राहत नहीं मिलने वाली है। कुछ ही समय में यह पूरी तरह से हरी-भरी वादी केवल एक बंजर कोयला खदान बनकर रह जाएगी।

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