मिडिल ईस्ट में अमेरिका-ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान से कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने से भारत में रासायनिक खाद, खासकर यूरिया का संकट गहरा सकता है।
मुंबई। मिडिल ईस्ट में अमेरिका-ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान से कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने से भारत में रासायनिक खाद, खासकर यूरिया का संकट गहरा सकता है। इस बीच रूस द्वारा खादों का निर्यात बंद करने और चीन की पाबंदी की वजह से आगामी खरीफ सीजन में धान की बुआई पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। इससे कृषि लागत बढ़ सकती है। हालाँकि, रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार किसानों को खाद की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए "मिशन यूरिया" के तहत अन्य देशों से आपूर्ति सुरक्षित करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के प्रयास कर रही है।
एलएनजी रुकावट से उत्पादन प्रभावित
ईरान-अमेरिका संघर्ष से होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के कारण प्राकृतिक गैस (LNG) की आपूर्ति रुकी है, जो यूरिया उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण है। सप्लाई चेन में रुकावट से फर्टिलाइजर कंपनियों को कच्चे माल की किल्लत हो रही है। एक अनुमान के मुताबिक घरेलू खाद कारखानों का उत्पादन लगभग 50% तक गिर गया है। खाद की सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड सहित कई कंपनियों ने या तो अपने कुछ प्लांटों को बंद कर दिया है या नियमित मरम्मत का काम शुरू कर दिया है। उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि एलएनजी की आपूर्ति फिर से शुरू होने पर किसी बंद प्लांट को दोबारा चालू करने में एक महीने तक का समय लग सकता है।
सब्सिडी का बढ़ता बोझ और आर्थिक प्रभाव
खाद उत्पादन बंद होने से न केवल उत्पादन प्रभावित होगा, बल्कि सरकार का सब्सिडी बिल भी 20-25 हजार करोड़ रुपए बढ़ सकता है। उर्वरक संकट के कारण किसानों की लागत बढ़ने और आने वाले समय में फसल उत्पादन घटने के साथ खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। "क्रिसिल" की रिपोर्ट के मुताबिक, कच्चे माल की कमी से कंपनियां पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाएंगी, जिससे उनके मुनाफे पर चोट पड़ेगी। सबसे ज्यादा असर नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों, खासकर यूरिया पर पड़ा है, जिसकी वैश्विक आपूर्ति का करीब 30% हिस्सा इस संकट से प्रभावित बताया जा रहा है। देश की उर्वरक खपत में यूरिया की हिस्सेदारी 45% है, जबकि कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर की हिस्सेदारी एक-तिहाई है।
आयात पर निर्भरता और कच्चे माल की चुनौती
देश यूरिया की 20% और डीएपी की करीब 33% जरूरत आयात से ही पूरी करता है। यूरिया उत्पादन में नेचुरल गैस की लागत कुल खर्च का 80% है। घरेलू भंडार सीमित होने से अमोनिया, फास्फोरिक एसिड जैसे कच्चे माल के लिए भारत विदेशों पर निर्भर है। यूरिया, डीएपी आयात के लिए मध्य-पूर्व सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है। वित्त वर्ष 2026 के शुरुआती 9 महीनों में कुल आयात का 40% हिस्सा यहीं से आया था। घरेलू खाद उत्पादन के लिए हम 60-65% एलएनजी और 75-80% अमोनिया इसी इलाके से मंगवाते हैं। क्रिसिल के मुताबिक, अगर सप्लाई तीन महीने भी बाधित रही तो उत्पादन पर भारी असर पड़ेगा।
उर्वरक महंगा होने का खतरा
उर्वरक उत्पादन लागत बढ़ने से सरकार का खाद सब्सिडी बजट अनुमानित 1.71 लाख करोड़ रुपए से 15% तक बढ़ सकता है। पिछले पांच साल में सरकार ने सब्सिडी बकाया चुकाने में तत्परता दिखाई है। समय पर सब्सिडी मिलने से कंपनियों के कामकाज पर बुरा असर नहीं पड़ेगा। फिलहाल वैकल्पिक स्रोतों से आयात पर विचार हो रहा है। इस संकट से बिल 25 हजार करोड़ बढ़ सकता है। युद्ध शुरू होने के बाद से अमोनिया की कीमतें 24% उछल चुकी हैं। इससे यूरिया निर्माताओं की लागत बढ़ जाएगी। सरकार ने यूरिया कंपनियों को 70% गैस आवंटित करने का निर्देश दिया है। तीन माह का स्टॉक है। उर्वरक महंगे होने या कमी होने से अनाज-सब्जियों के दाम बढ़ सकते हैं।
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