वैज्ञानिकों ने एक हैरान करने वाली खोज की है कि जब शरीर की कोशिकाएं (cells) गलत तरीके से बंटती हैं, तो उनका बर्ताव कैसा होता है।
टोक्यो (जापान )। कभी-कभी एक कोशिका अपने डीएनए (DNA) की नकल तो सफलतापूर्वक बना लेती हैं, लेकिन वह दो हिस्सों में अलग नहीं हो पाती। इसकी वजह से उस कोशिका में सामान्य से दोगुना जेनेटिक मटेरियल (अनुवांशिक सामग्री) इकट्ठा हो जाती है। इस गड़बड़ी का सीधा संबंध बुढ़ापे, कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों से है।
कोशिका विभाजन की गड़बड़ी और 'WGD' क्या है?
हमारे शरीर में हर सेकंड अनगिनत कोशिकाएं टूटकर नई कोशिकाएं बनाती हैं। यह जीवन की सबसे जरूरी प्रक्रियाओं में से एक है। अलग होने से पहले, कोशिका अपने पूरे डीएनए की एक कॉपी (नकल) बनाती है ताकि बनने वाली दोनों नई कोशिकाओं को पूरा जेनेटिक ब्लूप्रिंट मिल सके।
लेकिन कई बार यह तालमेल बिगड़ जाता है। डीएनए तो डबल हो जाता है, पर कोशिका पूरी तरह विभाजित नहीं हो पाती। इस स्थिति को वैज्ञानिक भाषा में 'होल जीनोम डुप्लीकेशन' (Whole Genome Duplication या WGD) कहते हैं। ऐसी अतिरिक्त डीएनए वाली कोशिकाएं सामान्य रूप से काम करना बंद कर सकती हैं, निष्क्रिय हो सकती हैं, मर सकती हैं या कैंसर जैसी बीमारियों को जन्म दे सकती हैं।
दो अलग-अलग रास्ते, दो अलग नतीजे
जापान की हॉक्काइडो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं (जैसे एसोसिएट प्रोफेसर रियोटा उएहारा) ने इस बात पर रिसर्च की कि कोशिका के गलत तरीके से बंटने के रास्ते का उसके भविष्य पर क्या असर पड़ता है। उन्होंने कोशिका विभाजन की दो मुख्य कमियों पर ध्यान दिया:
-
साइटोकिनेसिस फेलियर (Cytokinesis Failure): इसमें कोशिका विभाजन की पूरी प्रक्रिया तो लगभग पूरी कर लेती है, लेकिन आखिरी कदम पर आकर शारीरिक रूप से दो हिस्सों में नहीं बंट पाती।
-
माइटोटिक स्लिपेज (Mitotic Slippage): इसमें कोशिका बंटने की शुरुआत तो करती है, लेकिन गुणसूत्रों (chromosomes) के ठीक से अलग होने से पहले ही समय से पहले प्रक्रिया से बाहर आ जाती है।
क्या रही खोज?
वैज्ञानिकों ने पाया कि भले ही दोनों ही रास्तों में कोशिकाओं के पास दोगुना डीएनए बचता है, लेकिन उनके जिंदा रहने की संभावना बहुत अलग होती है:
-
साइटोकिनेसिस फेलियर से बनी कोशिकाएं ज्यादा स्थिर (stable) होती हैं और उनके जीवित रहने की संभावना अधिक होती है। ऐसा इसलिए क्योंकि इनमें गुणसूत्रों (chromosomes) का बंटवारा संतुलित रहता है।
-
माइटोटिक स्लिपेज से बनी कोशिकाओं में गुणसूत्र असमान रूप से (कम-ज्यादा) बंट जाते हैं। इस असंतुलन के कारण ये कोशिकाएं कमजोर हो जाती हैं और इनके जीवित रहने की संभावना काफी कम होती है।
जब वैज्ञानिकों ने प्रयोग के तौर पर 'माइटोटिक स्लिपेज' वाली कोशिकाओं में गुणसूत्रों के बंटवारे को सुधारा, तो वे कोशिकाएं भी काफी हद तक ठीक होने लगीं और जिंदा बच गईं।
कैंसर के इलाज में यह क्यों जरूरी है?
यह खोज कैंसर के इलाज और उसे रोकने में बहुत मददगार साबित हो सकती है। कैंसर कोशिकाओं में अक्सर यह दोगुना डीएनए (WGD) पाया जाता है। कई बार कैंसर की थेरेपी (इलाज) के दौरान अनजाने में भी कोशिकाएं इस स्थिति में पहुंच जाती हैं। अगर ये अतिरिक्त डीएनए वाली कोशिकाएं जिंदा बच जाती हैं, तो ये लगातार बढ़ती रहती हैं और भविष्य में कैंसर के दोबारा लौटने का कारण बन सकती हैं।
इस नई रिसर्च से उम्मीद जागी है कि अगर हम गुणसूत्रों के अलग होने की इस प्रक्रिया को निशाना बनाएं, तो ऐसी असामान्य और हानिकारक कोशिकाओं को जिंदा रहने और ट्यूमर को दोबारा बढ़ने से समय रहते रोका जा सकता है।
इसे भी पढ़ेंः थाईलैंड में मिला सबसे विशाल डायनासोर