पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित मशहूर गदून अमेज़ई इंडस्ट्रियल एस्टेट (GAIE) अब बंद होने की कगार पर पहुंच गया है।
खैबर पख्तूनख्वा (पाकिस्तान)। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित मशहूर गदून अमेज़ई इंडस्ट्रियल एस्टेट (GAIE) अब बंद होने की कगार पर पहुंच गया है। उद्योगपतियों ने चेतावनी दी है कि सरकार की लगातार अनदेखी, आसमान छूती ऑपरेशनल कॉस्ट और बुनियादी ढांचे की बदहाली के कारण कारोबार बंद करने की नौबत आ गई है। पाकिस्तानी अखबार 'डॉन' की रिपोर्ट के मुताबिक कई औद्योगिक इकाइयां पहले ही बंद हो चुकी है, वहीं बाकी कई कंपनियां भारी आर्थिक दबाव के बीच जैसे-तैसे संचालित हो रही हैं।
बिजली-गैस संकट और दूरदराज का इलाका बना मुसीबत
'डॉन' की रिपोर्ट के अनुसार इस इंडस्ट्रियल एस्टेट से जुड़े व्यापारिक नेताओं ने अपनी कई परेशानियों का जिक्र किया। उनकी शिकायत है कि यह इलाका बेहद दूरदराज में है जो अपने आप में एक बड़ी मुसीबत है। रही-सही कसर लगातार कटती बिजली, गैस की भारी किल्लत और लगातार महंगे होते जा रहे ट्रांसपोर्टेशन खर्च ने पूरी कर दी है। उद्योगपतियों का कहना है कि कराची से कच्चा माल मंगाने और फिर तैयार माल को पूरे पाकिस्तान में भेजने का खर्च काफी बढ़ गया है। इस भारी-भरकम लागत के कारण अब वे बाजार के प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पा रहे हैं।
देश छोड़ने या कारोबार समेटने की तैयारी
इन बदतर हालात से निवेशकों अब यह सोचने पर मजबूर हैं कि क्या इस इंडस्ट्रियल जोन में बिजनेस जारी रखना घाटे का सौदा तो नहीं है? स्वाबी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष फजल रहीम जदून ने इस पूरी स्थिति पर गहरी निराशा जताई है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर कहीं और बेहतर मौके मिले तो वे अपने उद्योगों को पाकिस्तान के किसी दूसरे इलाके या फिर सीधे विदेश शिफ्ट करने पर विचार करेंगे। फजल रहीम ने जोर देकर कहा कि इस समय अपने निवेश को बचाना और अपने परिवार का सुरक्षित भविष्य देखना ही उनकी सबसे पहली प्राथमिकता है।
अफीम की खेती रोकने के लिए बनी थी योजना
उद्योगपतियों ने उस दौर को भी याद किया जब साल 1988 में पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो की सरकार के दौरान इस एस्टेट की स्थापना हुई थी। तत्कालीन सरकार ने तब गदून अमेज़ई इलाके में अफीम उगाने वाले किसानों को आजीविका का दूसरा विकल्प देने के लिए इस औद्योगिक क्षेत्र बसाया था। हालांकि, अब हितधारकों का आरोप है कि सरकार का वह मूल उद्देश्य कभी पूरी तरह कामयाब नहीं हो सका क्योंकि प्रभावित परिवारों को कमाई के स्थाई साधन देने में सरकारें पूरी तरह नाकाम रहीं।
रियायतें छीनने से टूटा निवेशकों का भरोसा
पूर्व हितधारकों ने इस बर्बादी के लिए लगातार बदलने वाली सरकारी नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि शुरुआती दौर में 'SRO-517' के तहत मिले शानदार फायदों और छूट के लालच में देशभर के निवेशकों ने यहां पैसा लगाया था। लेकिन साल 1990 में सरकार ने अचानक इन फायदों को वापस ले लिया। इससे निवेशकों का भरोसा पूरी तरह टूट गया। इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों का तर्क है कि दशकों से प्रांतीय और संघीय सरकारों से गुहार लगाने के बावजूद आज तक जमीनी स्तर पर कोई सुधार नहीं हुआ है।
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