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5 साल में सुप्रीम-हाईकोर्ट के 75% जज

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में पांच वर्षों में नियुक्त तीन-चौथाई जज ऊंची जातियों के

नई दिल्ली। देश की अदालतों में 1 जनवरी, 2021 से 30 जनवरी, 2026 के दौरान नियुक्त लगभग तीन-चौथाई जज ऊंची जातियों के हैं।

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में पांच वर्षों में नियुक्त तीन-चौथाई जज ऊंची जातियों के

Supreme Court |

नई दिल्ली। देश की अदालतों में 1 जनवरी, 2021 से 30 जनवरी, 2026 के दौरान नियुक्त लगभग तीन-चौथाई जज ऊंची जातियों के हैं। प्रतिशत के हिसाब से पिछले पांच सालों में नियुक्त करीब 73.5 प्रतिशत जज सामान्य या उच्च जाति वर्ग से थे। यह जानकारी केंद्रीय कानून मंत्रालय ने हाल ही में राज्यसभा में दी।

हाईकोर्ट में नियुक्तियों का आंकड़ा

इस अवधि के दौरान विभिन्न हाईकोर्ट में कुल 593 जज नियुक्त किए गए। इनमें से 157 जज अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग या अल्पसंख्यक समुदायों से थे, जबकि शेष नियुक्तियां ऊंची जातियों से हुईं।

महिला जजों की संख्या सीमित

कानून मंत्रालय के अनुसार, इन पांच वर्षों में 96 महिलाओं को हाईकोर्ट जज के रूप में नियुक्त किया गया, जबकि अधिकांश पदों पर अब भी पुरुष जजों का ही दबदबा बना हुआ है।

लाइव लॉ की रिपोर्ट में विस्तृत विवरण

कानूनी मामलों की वेबसाइट लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, इस अवधि में 26 जज अनुसूचित जाति वर्ग से, 14 अनुसूचित जनजाति से, 80 ओबीसी वर्ग से और 37 अल्पसंख्यक समुदायों से नियुक्त किए गए। यह जानकारी कानून और न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने 5 फरवरी, 2026 को राज्यसभा में एक अतारांकित प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।

पी. विल्सन के सवाल पर सरकार का जवाब

राज्यसभा सांसद पी. विल्सन ने उच्च न्यायपालिका में सामाजिक विविधता और प्रतिनिधित्व को लेकर सरकार से जानकारी मांगी थी। उन्होंने 2021 से अब तक सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में नियुक्त एससी, एसटी, ओबीसी, सामान्य, महिला और अल्पसंख्यक जजों की संख्या पर सवाल उठाया था।

ऊंची जातियों के जजों का प्रतिशत

सरकार द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, 593 नियुक्तियों में से 436 जज (73.52 प्रतिशत) ऊंची जातियों से थे। वहीं 80 जज (13.49 प्रतिशत) ओबीसी, 37 जज (6.23 प्रतिशत) अल्पसंख्यक वर्ग से और शेष एससी-एसटी वर्ग से थे।

आरक्षण का प्रावधान नहीं

न्यायिक नियुक्तियों में सामाजिक विविधता के मुद्दे पर सरकार ने दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 के तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति में आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है। इसी कारण कैटेगरी-वाइज डेटा केंद्रीय स्तर पर नहीं रखा जाता।

2018 से सामाजिक पृष्ठभूमि की जानकारी अनिवार्य

हालांकि सरकार ने बताया कि वर्ष 2018 से हाईकोर्ट जज के लिए सिफारिश किए गए उम्मीदवारों को एक तय फॉर्मेट में अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि का खुलासा करना होता है। संसद में पेश किए गए आंकड़े इसी जानकारी पर आधारित हैं।

कॉलेजियम की भूमिका पर जोर

सरकार ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के प्रस्ताव शुरू करने का अधिकार चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के पास होता है। वहीं हाईकोर्ट में नियुक्तियों के लिए संबंधित हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस प्रस्ताव भेजते हैं। नियुक्तियां केवल सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों के आधार पर ही की जाती हैं।

सामाजिक विविधता बढ़ाने का अनुरोध

कानून मंत्रालय ने बताया कि वह हाईकोर्टों से एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक समुदायों और महिलाओं के उम्मीदवारों पर उचित विचार करने का अनुरोध करता रहा है, ताकि उच्च न्यायपालिका में सामाजिक विविधता बढ़ाई जा सके।

हाईकोर्टों में जजों की भारी कमी

मंत्रालय के अनुसार, 30 जनवरी, 2026 तक हाईकोर्टों में 1,122 जजों की स्वीकृत संख्या के मुकाबले 308 पद खाली हैं। फिलहाल देशभर के हाईकोर्टों में सिर्फ 814 जज कार्यरत हैं। इलाहाबाद, कलकत्ता और मद्रास जैसे प्रमुख हाईकोर्ट भी जजों की गंभीर कमी से जूझ रहे हैं।

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