उत्तर प्रदेश में शराब की दुकानों और विद्यालयों समेत अन्य संवेदनशील सार्वजनिक स्थलों के बीच न्यूनतम दूरी घटाने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया
उत्तर प्रदेश में शराब की दुकानों और विद्यालयों समेत अन्य संवेदनशील सार्वजनिक स्थलों के बीच न्यूनतम दूरी घटाने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकार का यह कदम सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए गए बाध्यकारी फैसले को निष्प्रभावी करने जैसा प्रतीत होता है और प्रथम दृष्टया यह विधायी अतिक्रमण का मामला है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से न्यूनतम दूरी कम करने के फैसले पर जवाब मांगा है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि राज्य सरकार का यह कदम कानूनी दखलअंदाजी जैसा लगता है।
1968 के नियमों में संशोधन पर सवाल
न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर पूछा है कि उत्तर प्रदेश शराब की दुकानों की संख्या और स्थान नियम, 1968 के नियम 5(4) में किए गए संशोधन को कानूनी दखल मानकर रद्द क्यों न किया जाए।
सात दिन में जवाब दाखिल करने के निर्देश
शीर्ष अदालत ने उप्र सरकार को सात दिनों के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। राज्य सरकार की सफाई पर विचार करने के लिए इस मामले को 5 फरवरी, 2026 को सूचीबद्ध किया गया है।
अदालत का सख्त रुख
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस न्यायालय के फैसले को ओवररीच किया है और हाईकोर्ट का विपरीत निष्कर्ष त्रुटिपूर्ण है। पीठ ने टिप्पणी की कि किसी बाध्यकारी न्यायिक निर्णय को नियम बनाने की शक्ति के माध्यम से अप्रभावी नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह टिप्पणी प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल उन अपीलों पर सुनवाई के दौरान की, जो इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2 फरवरी 2010 के फैसले के खिलाफ दायर की गई थीं।
हाईकोर्ट ने संशोधित नियम को किया था रद्द
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1968 के आबकारी नियमों के संशोधित नियम 5(4) को रद्द कर दिया था, हालांकि उसने इसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना नहीं माना था।
2008 के फैसले की दिलाई याद
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2008 में यूपी राज्य बनाम मनोज कुमार द्विवेदी मामले का हवाला देते हुए कहा कि तब शराब की दुकानों और स्कूल, अस्पताल, धार्मिक स्थल, बाजार व आवासीय क्षेत्रों के बीच न्यूनतम 100 मीटर दूरी तय की गई थी।
‘नजदीक’ शब्द को बताया गया था अस्पष्ट
अदालत ने कहा कि यह दूरी इसलिए तय की गई थी क्योंकि ‘नजदीक’ शब्द अस्पष्ट था और इसके दुरुपयोग की आशंका बनी रहती थी।
सरकार ने घटा दी थी न्यूनतम दूरी
इसके बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने नियम में संशोधन कर नगर निगम क्षेत्रों में दूरी 50 मीटर और नगर पालिका व नगर पंचायत क्षेत्रों में 75 मीटर निर्धारित कर दी।
मामले को बताया गया गंभीर
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए यूपी सरकार को स्वतः संज्ञान नोटिस जारी किया है और सात दिनों के भीतर जवाब मांगा है।
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