सर्वोच्च न्यायालय ने हाल में ही टिप्पणी की है कि जिन मामलों में ठोस संदेह न हो उनमें अभियोगपत्र दायर करने की प्रवृति से न्यायिक प्रक्रिया में बाधा पड़ती है।
नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल में ही टिप्पणी की है कि जिन मामलों में ठोस संदेह न हो उनमें अभियोगपत्र दायर करने की प्रवृति से न्यायिक प्रक्रिया में बाधा पड़ती है। इससे अदालत को बरी किए जाने योग्य मामलों में सुनवाई पर समय बर्बाद करना पड़ता है।
न्यायमूर्ति कोटेश्वर सिंह और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने स्पष्ट किया है कि यह भविष्यवाणी करने का कोई उपाय नहीं कि मामले में सजा हो सकती है या बरी किया जा सकता है। ऐसे में स्टेट को चाहिए कि जिन मामलों में दंडित किए जाने की संभावना नहीं हो वैसे मामले में किसी के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाना चाहिए। ऐसा करना सीमित न्यायिक संसाधनों का मजबूत और गंभीर मामलों से विचलित करना है। इससे मुकदमे लंबित पड़ते जाते है।
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