थार के रेगिस्तान में रात के अंधेरे में चमकती आंखों वाली रहस्यमयी जंगली बिल्ली, जिसे भारत में स्याहगोश और दुनिया में Caracal कहते हैं।
प्राचीन इतिहास में कैराकल के संकेत
लगभग 4000 से 5000 साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता के हड़प्पा स्थल से मिले एक खोपड़ी के टुकड़े को पहले घरेलू बिल्ली माना गया था, लेकिन 1982 में Zoological Survey of India के वैज्ञानिक मृण्मॉय घोष ने दोबारा जांच के बाद इसे कैराकल का अवशेष बताया। इसे भारतीय उपमहाद्वीप में कैराकल का सबसे पुराना प्रमाण माना जाता है। शिवालिक क्षेत्र में मिले जीवाश्म इस बात की ओर भी संकेत देते हैं कि यह प्रजाति लाखों वर्षों से इस भूभाग में मौजूद रही है।
थार का रहस्यमयी शिकारी
थार के रेगिस्तान में आज भी यह शिकारी अपनी कहानी को आगे बढ़ाता है। लंबे काले कानों के गुच्छे, हल्के रेतीले शरीर और हवा में ऊंची छलांग लगाने की क्षमता इसे बेहद खास बनाती है। कैराकल अकेला रहना पसंद करता है और रात में शिकार करता है। इसकी नजर इतनी तेज होती है कि अंधेरे में भी हलचल पकड़ लेती है। यह लगभग 3 मीटर तक छलांग लगाकर उड़ते पक्षियों को भी पकड़ सकता है।
मुगल काल में शाही शिकारी
इतिहास में कैराकल को शाही दरबारों में भी जगह मिली थी। मुगल काल में इसे शिकार के लिए प्रशिक्षित किया जाता था। अकबर और जहांगीर जैसे शासक इसके शिकार कौशल से प्रभावित थे। “कबूतर प्रतियोगिता” में कैराकल को उड़ते पक्षियों को पकड़ने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
भारत में फैलाव से सिमटता दायरा
एक समय यह प्रजाति भारत के 13 से अधिक राज्यों में पाई जाती थी—राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और अन्य क्षेत्र शामिल थे। आज स्थिति यह है कि यह केवल राजस्थान और गुजरात के कुछ हिस्सों तक सीमित रह गया है।
आबादी में भारी गिरावट
पिछले 100 वर्षों में कैराकल की संख्या में लगभग 95% की गिरावट दर्ज की गई है। आज भारत में इनकी संख्या 50 से भी कम मानी जाती है, कुछ रिपोर्ट्स में यह 30–40 के बीच बताई जाती है।
विलुप्ति के खतरे की वजहें
कैराकल के घटने के पीछे कई कारण माने जाते हैं:
- आवास का लगातार नष्ट होना
- खेती और शहरीकरण का विस्तार
- अवैध शिकार और तस्करी
- विदेशी “एक्सोटिक पेट्स” की मांग
कानूनी सुरक्षा और संरक्षण प्रयास
भारत सरकार ने कैराकल को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची-1 में रखा है, जिससे इसे सर्वोच्च सुरक्षा प्राप्त है।वन विभाग और वैज्ञानिक कैमरा ट्रैप तकनीक से इसकी निगरानी कर रहे हैं।
Wildlife Institute of India की मदद से राजस्थान, कच्छ और जैसलमेर जैसे क्षेत्रों में इसकी मौजूदगी की पुष्टि हुई है।
पारिस्थितिकी में अहम भूमिका
कैराकल छोटे जानवरों जैसे चूहों और खरगोशों की संख्या नियंत्रित करता है। यदि यह प्रजाति खत्म होती है, तो पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ सकता है और इसका असर खेती पर भी पड़ सकता है।
संरक्षण के लिए नए कदम
राजस्थान में रेडियो कॉलर तकनीक और “Species Recovery Plan” के तहत कैराकल को बचाने की कोशिशें चल रही हैं। सरकार 22 संकटग्रस्त प्रजातियों की सूची में इसे शामिल कर संरक्षण कार्यक्रम चला रही है।
जंगल का यह शिकारी हमारी जिम्मेदारी है
कैराकल सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन का अहम हिस्सा है। अगर यह विलुप्त हो गया, तो यह केवल एक प्रजाति का अंत नहीं होगा, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ेगा।
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