इंदौर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने मंदिरों के प्रबंधन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है...
इंदौर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने मंदिरों के प्रबंधन को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य सरकार या जिला प्रशासन किसी भी निजी मंदिर (Private Temple) के प्रबंधन में सीधे तौर पर हस्तक्षेप नहीं कर सकता और न ही उन पर अपनी कोई प्रबंधन योजना थोप सकता है। अदालत ने यह आदेश 'राजेंद्र प्रसाद शर्मा बनाम मध्य प्रदेश राज्य' मामले की सुनवाई के दौरान दिया।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसला बना आधार
हाई कोर्ट ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले 'स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश बनाम पुजारी उत्थान एवं कल्याण समिति' का हवाला दिया। अदालत ने कानूनी स्थिति को स्पष्ट किया कि मंदिर में स्थापित देवी-देवता (Deity) ही उस मंदिर और उससे जुड़ी संपत्ति के वास्तविक कानूनी स्वामी होते हैं। पुजारी का पद केवल मंदिर में पूजा-अर्चना करने और देवता की संपत्ति की देखरेख (प्रबंधन) करने के लिए होता है। उन्हें संपत्ति बेचने या मालिकाना हक जताने का अधिकार नहीं होता।
जिला कलेक्टरों को भी सख्त निर्देश
हाई कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य के सभी जिला कलेक्टरों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं वे किसी भी मंदिर के मामले में जल्दबाजी में निर्णय न लें। किसी भी मंदिर पर अपनी कोई प्रबंधन योजना (Management Scheme) लागू करने या सरकारी नियंत्रण में लेने से पहले प्रशासन को पूरी जांच करनी होगी।
प्रशासन को पहले तय करना होगा कि संपत्ति निजी है या सार्वजनिक
प्रशासन को सबसे पहले यह तय करना होगा कि संबंधित मंदिर सार्वजनिक (Public) है या निजी (Private)। यदि मंदिर पूरी तरह से निजी है तो सरकार उसके आंतरिक प्रबंधन में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इस फैसले से उन निजी और पारिवारिक मंदिरों को बड़ी राहत मिली है, जहां स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रबंधन या रखरखाव के नाम पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा था। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि बिना उचित जांच के किसी भी मंदिर को सार्वजनिक मानकर उस पर सरकारी नियम लागू नहीं किए जा सकते।
यह भी पढ़ें : https://www.primenewsnetwork.in/state/heatwave-alert-in-maharashtra-vidarbha-46c/206477