इंदौर। शहर दो दशकों में पूरी तरह बदल चुका है। लेकिन इंदौर पुलिस का नक्शा आज भी 20 साल पुराने कागजों में अटका हुआ है। इसका खामियाजा शहर की जनता को भुगतना पड़ रहा है।
इंदौर। शहर दो दशकों में पूरी तरह बदल चुका है। लेकिन इंदौर पुलिस का नक्शा आज भी 20 साल पुराने कागजों में अटका हुआ है। इसका खामियाजा शहर की जनता को भुगतना पड़ रहा है। हालात यह हैं कि किसी वारदात के समय पास में थाना होने के बावजूद पुलिस को 20 किलोमीटर दूर से आना पड़ता है, जिससे अपराधियों को भागने के लिए 'ग्रीन कॉरिडोर' मिल जाता है।
सीमा विवाद में उलझी पुलिस, जनता परेशान
शहर के चार प्रमुख थाना क्षेत्रों की सीमाओं में सबसे ज्यादा विसंगतियां हैं। तेजाजी नगर बनाम खुडैल का ही मामला लें। तेजाजी नगर थाने से महज 1.5 से 2 किमी की दूरी पर रहने वाली जनता की सुरक्षा का जिम्मा 20 किमी दूर स्थित खुडैल थाने पर है।
रिस्पॉन्स टाइम में होती है देरी
वहीं, फिनिक्स मॉल क्षेत्र के कनाड़िया थाना नजदीक है, लेकिन सीमा विवाद के कारण रिस्पॉन्स टाइम में देरी होती है। लसूड़िया थाने के करीब स्थित कुछ क्षेत्रों के लिए पुलिस को 15 से 20 किमी का सफर तय कर खुडैल से आना पड़ता है। गांधीनगर थाने के पास स्थित क्षेत्रों की जिम्मेदारी 15 किमी दूर हातोद थाने की है।
पुलिस पहुंचती है, पहले फरार हो जाते हैं अपराधी
जब तक 20 किमी दूर से पुलिस मौके पर पहुँचती है (लगभग 30-40 मिनट), तब तक अपराधी वारदात को अंजाम देकर आसानी से फरार हो जाते हैं। सीमाओं पर स्पष्टता न होने के कारण पुलिस गश्त (Patrolling) भी प्रभावित हो रही है। बाहरी गैंग और कंजर गिरोह इन 'नो-मैन्स लैंड' क्षेत्रों का फायदा उठा रहे हैं।
एक से दूसरे थाने का चक्कर लगाना पड़ता है
किसी वारदात के बाद जब पीड़ित पास के थाने पहुँचता है, तो उसे 'क्षेत्राधिकार' (Jurisdiction) का हवाला देकर दूसरे दूरदराज के थाने भेज दिया जाता है। पुलिस की देरी का लाभ उठाकर अपराधियों को शहर से बाहर निकलने का सुरक्षित रास्ता मिल जाता है।
शहरीकरण हुआ पर थाने जस-के-तस
इंदौर में शहरीकरण के साथ नई कॉलोनियां और बस्तियां बस गई हैं, लेकिन पुलिस थानों का परिसीमन (Delimitation) न होने से सुरक्षा व्यवस्था लचर हो गई है। हाल ही में हुई कुछ डकैती और चोरी की घटनाओं ने इस 'सीमा विवाद' की पोल खोल दी है, जहाँ पुलिस के पहुँचने से पहले ही अपराधी सीमा पार कर चुके होते हैं। यह दूरी सिर्फ किलोमीटर की नहीं है, बल्कि जान-माल की सुरक्षा के बीच का फासला है।
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