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सुप्रीम कोर्ट बोला - जिसे सूचना के अधिकार से छूट..

क्या मप्र लोकायुक्त खुफिया संगठन है? जिसे सूचना के अधिकार से छूट दी : सुप्रीम कोर्ट

भोपाल। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन को सूचना के अधिकार (RTI) से दी गई छूट पर बेहद गंभीर सवाल उठाए हैं...

क्या मप्र लोकायुक्त खुफिया संगठन है जिसे सूचना के अधिकार से छूट दी  सुप्रीम कोर्ट

क्या मप्र लोकायुक्त खुफिया संगठन है? जिसे सूचना के अधिकार से छूट दी : सुप्रीम कोर्ट |

भोपाल। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन को सूचना के अधिकार (RTI) से दी गई छूट पर बेहद गंभीर सवाल उठाए हैं। लोकायुक्त संगठन (मप्र स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट) की एक अपील पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए पूछा कि क्या यह कोई खुफिया या सुरक्षा संगठन है, जिसे आरटीआई अधिनियम 2005 की धारा 24(4) के तहत छूट दी जा सकती है? जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि मध्य प्रदेश सरकार रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी तथ्य पेश नहीं कर सकी है, जिससे यह साबित हो सके कि लोकायुक्त संगठन कोई खुफिया या सुरक्षा एजेंसी है।

अधिसूचना आरटीआई की भावना के प्रतिकूल

​सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि इस स्पष्टीकरण के बिना साल 2011 में सरकार द्वारा जारी की गई छूट संबंधी अधिसूचना आरटीआई कानून की मूल भावना के विपरीत नजर आती है और इसका कानूनी आधार भी बेहद कमजोर प्रतीत होता है। इस मामले में हाईकोर्ट पहले ही लोकायुक्त को 30 दिनों के भीतर जानकारी देने और ऐसा न करने पर 5,000 रुपये का जुर्माना भरने का आदेश दे चुका है।

​मप्र सरकार के वकीलों के रवैये पर नाराजगी

​सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार के वकीलों के रवैए पर भी गहरी नाराजगी जताई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अक्सर मध्य प्रदेश से जुड़े मामलों में सरकारी वकील अदालत में उपस्थित नहीं रहते हैं। इसी वजह से कोर्ट ने सरकारी वकीलों के पैनल की समीक्षा करने के निर्देश दिए हैं, ताकि अदालत में प्रभावी और सही तरीके से प्रतिनिधित्व नहीं करने वाले वकीलों पर उचित फैसला लिया जा सके।

सुनवाई में अधिवक्ता के व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश

अदालत ने सख्ती दिखाते हुए मध्य प्रदेश के महाधिवक्ता प्रशांत सिंह को 20 मई की सुनवाई में खुद व्यक्तिगत रूप से पेश होने के निर्देश दिए हैं। उन्हें कोर्ट के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि लोकायुक्त संगठन को आरटीआई के दायरे से बाहर रखने के लिए किस कानूनी आधार का उपयोग किया गया था। यदि कोर्ट को संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो साल 2011 की उस अधिसूचना को निरस्त (कैंसिल) किया जा सकता है।

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