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मप्र के चंबल में पाई जाती हैं कछुओं...

मप्र के चंबल में पाई जाती हैं कछुओं की नौ प्रजातियां

ग्वालियर। कछुए के अंडे से बच्चे निकलने से पहले कछुआ मां पानी से बाहर रेत के ऊपर 'मदर कॉल' करती है...

मप्र के चंबल में पाई जाती हैं कछुओं की नौ प्रजातियां

मप्र के चंबल में पाई जाती हैं कछुओं की नौ प्रजातियां |

ग्वालियर। कछुए के अंडे से बच्चे निकलने से पहले कछुआ मां पानी से बाहर रेत के ऊपर 'मदर कॉल' करती है। अंडे से रेत हटाने से ठीक पहले अंडे में से बच्चे चहचहाने लगते हैं। इसके बाद कछुआ मां उन्हें सुरक्षित पानी में ले जाती है।​चंबल में कछुओं की 9 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें रेड क्राउन, शॉर्ट हेडेड, इंडियन टेंट टर्टल, इंडियन सॉफ्टशेल, इंडियन पीकॉक और चित्रा इंडिका आदि शामिल हैं। इनमें से कई प्रजातियां लुप्तप्राय होने की कगार पर थीं, जिन्हें बचाने के लिए चंबल नदी में विशेष संरक्षण परियोजनाएं चलाई जा रही हैं।

घोंसले के पास कछुए के अंडे

मादा कछुआ चंबल नदी के किनारे रेतीले घाटों पर लगभग 1 फीट गहरा गड्ढा खोदकर घोंसला बनाती है। उसमें 30 से 40 तक अंडे रह सकते हैं। घोंसलों को इंसानी गतिविधियों और जंगली जानवरों (जैसे सियार, कुत्ते व अन्य वन्यजीव) से बचाने के लिए चंबल की वन टीम व 'टर्टल सर्वाइवल एलायंस' (TSA) की मदद से सुरक्षित किया जाता है। सुरक्षा के कड़े इंतजामों के बीच चंबल सफारी में अंडों से उचित तापमान व नमी मिलने के बाद बच्चों का जन्म होता है। इस साल भी कछुओं के संरक्षण केंद्रों में 7344 कछुओं ने जन्म लिया है।

​चंबल में कछुओं की 9 प्रजातियां

रेड क्राउन • शॉर्ट हेडेड • इंडियन टेंट • इंडियन सॉफ्टशेल • इंडियन रूफ्ड टर्टल • इंडियन पीकॉक • चित्रा इंडिका • फ्लैपशेल टर्टल सबसे ज्यादा संख्या चंबल में है।

विशेष रेस्क्यू वनों में...

सुरक्षा टीम रेत पर कछुओं के पैरों के निशान ढूंढती है। निशान मिलने से घोंसले का पता चलता है, जिसके बाद अंडों को सुरक्षित हैचरी में शिफ्ट कर दिया जाता है। 325 घोंसलों को बचाया जा चुका है। इनमें से सुरक्षित बाहर निकलकर बच्चे चंबल नदी में पानी की लहरों में पलायन कर चुके हैं।

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