ढाका: बांगलादेश में BNP की सरकार बनना तय, तारिक रहमान प्रधानमंत्री बन सकते हैं, पार्टी को 300 सीटों वाली संसद में स्पष्ट बहुमत मिला।
ढाका। बांगलादेश में बीएनपी (बांगलादेश नेशनल पार्टी) की सरकार बनना तय है। माना जा रहा है कि पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान सरकार के मुखिया होंगे। उनकी पार्टी को 300 सीटों वाली संसद में स्पष्ट बहुमत मिल चुका है। शुक्रवार के सुबह 11 बजे तक घोषित 286 सीटों में से बीएनपी को 176 सीटें मिल चुकी हैं, जबकि 11 पार्टियों के गठबंधन वाली जमात इस्लामी को 57 सीटें हासिल हुई हैं। देश में करीब 20 साल बाद बीएनपी की सत्ता में वापसी हो रही है। करीब 35 साल बाद कोई पुरुष बांगलादेश का प्रधानमंत्री बनेगा। 1988 में काजी जफर अहमद प्रधानमंत्री थे। इसके पहले 1991 से लेकर 2024 तक बीएनपी और आवामी लीग की सरकार के दौरान क्रमशः खालिदा जिया और शेख हसीना प्रधानमंत्री रही हैं। देश की राजनीति में इन्ही दोनों महिलाओं का दबदबा रहा है।
35 साल बाद पुरुष प्रधानमंत्री की संभावना
तारिक रहमान पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के पुत्र हैं। 2007 में उनके ऊपर अंतरिम सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। कुछ दिनों के लिए इन्हीं आरोपों में वे जेल में बंद थे। इसके बाद सरकार ने उहें इलाज के लिए ब्रिटेन जाने की अनुमति दी, लेकिन वे वापस नहीं लौटे। 1980 से 1990 तक उन्होंने बीएनपी की छात्र शाखा से अपनी राजनीति शुरू की थी। 17 साल बाद 25 जनवरी को वे वापस बांगलादेश लौटे। इसके चार-पांच दिन बाद ही नकी माता खालिया जिया कका निधन हो गया। इसके बाद पार्टी की कमान पूरी तरह से उनके हाथ में आ गई। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से जीत कती जश्न नहीं मनाने की अपील की है। लीग समर्थकों ने बीएनपी के पक्ष में किया मतदान गौरतलब है कि चुनाव में अवामी लीग पर प्रतिबंध होने के कारण उसके समर्थकों के वोट बीएनपी को ट्रांसफर हो गए। लीग को बैन किए जाने के बाद लीग समर्थकों के पास कोई विकल्प नहीं था। दूसरी तरफ हिंदुओं ने भी बीएनपी की जीत में योगदान दिया। हिदुंओं पर लागातार हो रहे हमले इसकी वजह बने।
जमात और नेशनल सिटीजन पार्टी बुरी तरह हारी
वहीं शेख हसीना को सत्ता से हटाने वाले छात्र नेताओं की पार्टी नेशनल सिटीजन पार्टी को बुरी तरह पराजय का सामना करना पड़ा है। राजनीतिक विश्लेषक जमात ए इस्लामी का बीएनपी से नजदीकी मुकाबले का अनुमान लगा रहे थे, लेकिन मतदाताओं ने इसे भी बुरी तरह नकार दिया है। जमात को इसलिए भी हार का सामना करना पड़ा क्योंकि वह बांगलादेश मुक्ति संग्राम का विरोधी रही है।
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