मुंबई: आजकल फिल्मों के टाइटल रिलीज से पहले ही विवाद की वजह बन रहे हैं। नाम सामने आते ही सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो जाती है—किसी को धार्मिक भावनाओं की चिंता होती है, तो किसी को राजनीति नजर आती है।
मुंबई: आजकल फिल्मों के टाइटल रिलीज से पहले ही विवाद की वजह बन रहे हैं। नाम सामने आते ही सोशल मीडिया पर बहस शुरू हो जाती है—किसी को धार्मिक भावनाओं की चिंता होती है, तो किसी को राजनीति नजर आती है। हाल में ‘द केरल स्टोरी 2’, ‘घूसखोर पंडित’ और ‘यादव जी की लव स्टोरी’ जैसे मामलों ने इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया।
रिलीज से पहले ही विरोध और धमकियां
‘यादव जी की लव स्टोरी’ के निर्देशक अंकित भड़ाना का कहना है कि फिल्म रिलीज से पहले ही उन्हें विरोध का सामना करना पड़ा। उनके मुताबिक, लोग कहानी जाने बिना सिर्फ नाम देखकर राय बना रहे हैं, जबकि टाइटल फिल्म के मुख्य किरदार पर आधारित है, किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं।
टाइटल से बदल गई फिल्म की धारणा
‘घूसखोर पंडित’ से जुड़े कलाकारों का कहना है कि फिल्म की कहानी हल्की-फुल्की और मनोरंजक है, लेकिन नाम देखकर लोगों ने अलग ही मतलब निकाल लिया। विवाद बढ़ने के बाद मेकर्स ने टाइटल बदलने का फैसला किया, ताकि फिल्म बिना तनाव के दर्शकों तक पहुंच सके।
फिल्म का नाम तय कैसे होता है?
फिल्मों के टाइटल तय करने के लिए इंडस्ट्री में कुछ तय नियम हैं—
- निर्माता को अपना टाइटल फिल्म एसोसिएशनों में रजिस्टर कराना होता है।
- अगर कोई नाम पहले से दर्ज है, तो वही नाम दोबारा नहीं मिल सकता।
- जरूरत पड़ने पर टाइटल के लिए क्लीयरेंस लेना पड़ता है।
- बड़े बैनर अपनी फिल्म या फ्रेंचाइजी के नाम को ट्रेडमार्क भी कराते हैं, ताकि कोई और उसका इस्तेमाल न कर सके।
अदालत तक पहुंच चुके हैं कई मामले
- ‘द केरल स्टोरी 2’ के टाइटल पर हाई कोर्ट ने रोक लगाते हुए कहा कि इससे दर्शक भ्रमित हो सकते हैं।
- ‘घूसखोर पंडित’ के मामले में विवाद बढ़ने पर मेकर्स ने नाम बदलने का फैसला किया।
- ‘यादव जी की लव स्टोरी’ पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि टाइटल से किसी समुदाय का अपमान नहीं होता और याचिका खारिज कर दी।
सोशल मीडिया ने बढ़ाई बहस
आज के दौर में फिल्म का नाम ही उसकी पहली पहचान बन जाता है। ऐसे में जरा सा भी विवादित शब्द बड़ी बहस छेड़ देता है। कई बार कहानी सामने आने से पहले ही फिल्म को लेकर माहौल बन जाता है।
टाइटल क्यों है इतना अहम?
फिल्म का नाम सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि उसकी मार्केटिंग और दर्शकों की पहली छाप भी होता है। यही वजह है कि मेकर्स आकर्षक और अलग नाम रखना चाहते हैं, लेकिन अब उन्हें यह भी देखना पड़ता है कि कहीं वही नाम विवाद का कारण न बन जाए। फिल्म का टाइटल तय करना सिर्फ क्रिएटिव फैसला नहीं, बल्कि कानूनी और सामाजिक जिम्मेदारी भी बन गया है। नाम छोटा होता है, लेकिन असर बहुत बड़ा छोड़ता है।
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